कानून हत्यारे को सजा देगा, लेकिन उस मां के बचे हुए जीवन की जिम्मेदारी कौन उठाएगा?
लेखक : अशोक कुमार झा
प्रधान संपादक — रांची दस्तक हिंदी दैनिक
संस्थापक-सह राष्ट्रीय अध्यक्ष — सर्वजन विकास पार्टी
समाचार हमारे लिए केवल एक घटना नहीं है। समाचार समाज के सामने रखी गई वह सच्चाई है, जिसके माध्यम से हम अपने आसपास की परिस्थितियों को देखते और समझते हैं। पत्रकारिता का पहला धर्म है कि जो हुआ है, उसे बिना किसी भय, दबाव अथवा पक्षपात के ईमानदारी के साथ समाज तक पहुंचाया जाए। लेकिन हमारा मानना है कि पत्रकारिता की जिम्मेदारी केवल घटना को बताकर समाप्त नहीं हो जाती। जब किसी घटना के पीछे कोई ऐसी मानवीय पीड़ा दिखाई देती है, जो खबर की कुछ पंक्तियों में दबकर रह जाती है, तब उस पीड़ा को समाज, शासन और व्यवस्था के सामने रखना भी पत्रकारिता का धर्म है। क्योंकि खबर यदि समाज को सच दिखाती है तो संपादकीय उस सच पर विचार करने और व्यवस्था से सवाल पूछने का माध्यम बनता है।
इसी क्रम में मधुबनी जिले के झंझारपुर अनुमंडल के भैरवस्थान थाना क्षेत्र अंतर्गत हैंठीबाली गांव में सामने आई एक युवक की हत्या की घटना ने हमें भीतर तक झकझोर दिया। करीब तीस वर्षीय एक नौजवान की हत्या कर दी गई। घटना की जांच पुलिस कर रही है और हत्या के कारणों तथा आरोपियों को लेकर अनुसंधान जारी है। सामान्य पत्रकारिता की दृष्टि से यह एक हत्या की खबर है—मृतक कौन था, घटना कैसे हुई, पुलिस ने क्या कार्रवाई की और आरोपी कौन हैं, इन सवालों के जवाब तलाशना जरूरी है। लेकिन इस खबर को लिखते हुए हमारी नजर अचानक उस व्यक्ति पर चली गई, जिसकी आवाज इस घटना के बाद शायद सबसे कम सुनी जा रही है। वह व्यक्ति है—उस मृत युवक की मां।
यहीं से यह घटना हमारे लिए केवल हत्या की खबर नहीं रह जाती, बल्कि एक बड़े सामाजिक प्रश्न में बदल जाती है। एक नौजवान चला गया। उसकी जिंदगी समाप्त हो गई। लेकिन उसके जाने के बाद उसकी मां की जिंदगी तो अभी बाकी है। वह मां, जिसने अपने बेटे को बड़ा किया, उसके सहारे अपने जीवन की अंतिम पारी काटने का सपना देखा होगा, आज उसी बेटे के शव के बाद अपने भविष्य की ओर देख रही है। उसके सामने सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि कल क्या हुआ था, बल्कि यह है कि आज से उसका जीवन कैसे चलेगा।
बताया जाता है कि मृत युवक अपने परिवार का प्रमुख कमाने वाला सहारा था। पिता का पहले ही निधन हो चुका था। घर में मां और बेटा ही मुख्य सहारा थे। सीमित संसाधनों के बीच वह युवक धार्मिक कार्यक्रमों और भजन-कीर्तन से जुड़े कार्यों के माध्यम से अपनी तथा अपनी मां की जरूरतें पूरी करता था। कोई बड़ा व्यवसाय नहीं, कोई मजबूत आर्थिक आधार नहीं और न ही ऐसा परिवार जिसके पास अचानक आई विपत्ति से लड़ने के लिए पर्याप्त साधन हों। वह साधारण परिवार का साधारण युवक था, लेकिन अपनी मां के लिए वही पूरी दुनिया था। आज वह दुनिया उजड़ चुकी है।
सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि उस मां का अब क्या होगा?
हमारे देश में सरकारें गरीबों के लिए अनेक योजनाएं चलाती हैं। प्रधानमंत्री आवास योजना से लेकर राशन, पेंशन, स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा तक अनेक योजनाओं का उद्देश्य समाज के अंतिम व्यक्ति तक सरकारी सहायता पहुंचाना है। राज्य सरकारें भी गरीब और जरूरतमंद परिवारों के लिए अनेक कल्याणकारी योजनाएं संचालित करती हैं। लेकिन योजनाओं की वास्तविक सफलता तब मानी जाएगी, जब उनका लाभ उस व्यक्ति तक पहुंचे जिसे वास्तव में उनकी सबसे अधिक जरूरत है।
अगर किसी गरीब परिवार का कमाने वाला सदस्य ही हत्या का शिकार हो जाए और पीछे वृद्ध मां अकेली रह जाए, तो उस परिवार की स्थिति का तत्काल सामाजिक और प्रशासनिक आकलन होना चाहिए। यह केवल संवेदना व्यक्त करने का विषय नहीं, बल्कि मानवीय और प्रशासनिक जिम्मेदारी का विषय है।
हम यहां किसी सरकार को कटघरे में खड़ा करने के लिए सवाल नहीं कर रहे हैं। हमारा सवाल व्यवस्था से है। हमारा सवाल उन सभी लोगों से है, जिनके कंधों पर समाज के कमजोर और जरूरतमंद लोगों की जिम्मेदारी है। क्या स्थानीय जनप्रतिनिधि उस मां के घर तक जाएंगे? क्या पंचायत उस परिवार की स्थिति देखेगी? क्या प्रखंड प्रशासन यह पता करेगा कि वह महिला सरकारी आवास की पात्र है या नहीं? क्या उसे राशन मिल रहा है? क्या वह सामाजिक सुरक्षा पेंशन की पात्र है? क्या उसके पास रहने के लिए सुरक्षित घर है? क्या उसके इलाज और दैनिक जीवन की कोई व्यवस्था है?
ये सवाल इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि किसी भी सभ्य समाज की पहचान केवल इस बात से नहीं होती कि वह अपराधियों को कितनी सजा देता है। सभ्य समाज की पहचान इस बात से भी होती है कि वह अपराध के बाद पीड़ित परिवार को किस तरह संभालता है।
मान लीजिए कि पुलिस हत्यारों को गिरफ्तार कर लेती है। अदालत में मुकदमा चलता है और दोष सिद्ध होने पर उन्हें कठोरतम सजा भी मिल जाती है। कानून अपना काम कर देता है। लेकिन क्या उस मां का बेटा वापस आ जाएगा? नहीं। क्या उसके घर में फिर से बेटे की आवाज सुनाई देगी? नहीं। क्या उसकी जिंदगी में वह आर्थिक सहारा लौट आएगा? नहीं। इसलिए अपराधी को सजा दिलाना न्याय का एक हिस्सा है, लेकिन पीड़ित परिवार को सम्मानपूर्वक जीवन जीने लायक बनाना न्याय का दूसरा और उतना ही महत्वपूर्ण हिस्सा है।
यहां हमें यह भी समझना होगा कि गरीबी किसी जाति की पहचान नहीं हो सकती। गरीब ब्राह्मण हो, गरीब दलित हो, गरीब आदिवासी हो, गरीब पिछड़ा हो या किसी भी समुदाय का गरीब व्यक्ति—उसकी गरीबी और उसकी पीड़ा को समान संवेदना मिलनी चाहिए। हमारा संविधान प्रत्येक नागरिक को समानता, गरिमा और न्याय का अधिकार देता है। इसलिए किसी जरूरतमंद परिवार की सहायता उसकी जाति देखकर नहीं, बल्कि उसकी वास्तविक स्थिति देखकर होनी चाहिए।
लेकिन इस घटना में एक विशेष विडंबना जरूर दिखाई देती है। जिस घर में कमाने वाला युवक था, वह आज नहीं है। जिस घर की आर्थिक व्यवस्था किसी तरह चल रही थी, वह सहारा अचानक समाप्त हो गया। जिस मां के पास अपने बुढ़ापे में बेटे का सहारा था, वह सहारा अपराधियों ने छीन लिया। और यदि उस घर की आर्थिक स्थिति पहले से कमजोर थी, तो अब उसकी स्थिति और भी गंभीर हो गई होगी।
क्या ऐसी परिस्थिति में प्रशासन केवल पंचनामा और प्राथमिकी तक सीमित रह सकता है?
क्या किसी अधिकारी की जिम्मेदारी केवल घटना की जांच तक है?
क्या जनप्रतिनिधियों का दायित्व केवल चुनाव के समय जनता के बीच जाना है?
क्या सरकार की योजनाएं केवल आंकड़ों और सरकारी रिपोर्टों में सफल होने के लिए हैं?
या फिर इन योजनाओं की असली परीक्षा ऐसे ही किसी टूटे हुए घर के दरवाजे पर होती है?
यह संपादकीय किसी व्यक्ति विशेष पर आरोप लगाने के लिए नहीं है। यह व्यवस्था को जगाने की कोशिश है। हम चाहते हैं कि इस घटना के बाद संबंधित प्रशासन उस परिवार की वास्तविक स्थिति का संज्ञान ले। यदि महिला आवास की पात्र है तो उसे आवास मिले। यदि राशन की जरूरत है तो नियमित राशन मिले। यदि पेंशन की पात्रता है तो पेंशन मिले। यदि चिकित्सा सहायता की जरूरत है तो स्वास्थ्य सुविधा मिले। और यदि कानून में पीड़ित परिवार के लिए किसी प्रकार की आर्थिक सहायता या पुनर्वास का प्रावधान है, तो उसकी जानकारी देकर नियमानुसार सहायता उपलब्ध कराई जाए।
क्योंकि किसी गरीब परिवार को केवल सांत्वना की जरूरत नहीं होती। उसे जीवन जीने का आधार चाहिए।
हम अक्सर हत्या की खबरों में लिखते हैं—“पुलिस ने जांच शुरू कर दी है।” लेकिन इस वाक्य के बाद एक दूसरा वाक्य भी होना चाहिए—“प्रशासन ने पीड़ित परिवार की सामाजिक और आर्थिक स्थिति का भी जायजा लिया।” यही संवेदनशील शासन की पहचान होगी।
आज उस मां के सामने अपने बेटे की यादें हैं। उसके सामने खाली घर है। उसके सामने भविष्य की अनिश्चितता है। उसके सामने आर्थिक संकट है। और सबसे बड़ी बात, उसके पास अपना दर्द सुनाने वाला शायद कोई नहीं है। ऐसी स्थिति में समाज और शासन दोनों की जिम्मेदारी बढ़ जाती है।
एक पत्रकार के रूप में हमारा काम केवल यह बताना नहीं है कि हत्या हुई। हमारा काम यह पूछना भी है कि हत्या के बाद उस घर में चूल्हा कैसे जलेगा?
हमारा काम केवल यह पूछना नहीं है कि आरोपी कब पकड़ा जाएगा। हमारा काम यह पूछना भी है कि जिस मां ने अपना इकलौता सहारा खो दिया, उसके बचे हुए जीवन का सहारा कौन बनेगा?
और हमारा काम केवल यह देखना नहीं है कि कानून अपराधी को कितनी सजा देता है। हमारा काम यह पूछना भी है कि पीड़ित परिवार को सम्मानपूर्वक जीवन देने के लिए व्यवस्था क्या करेगी?
यही पत्रकारिता और केवल सनसनी फैलाने वाली खबर में अंतर है। खबर घटना बताती है, लेकिन संवेदनशील पत्रकारिता घटना के पीछे छिपे इंसान को खोजती है। वह उस आवाज को सामने लाती है, जो भीड़ और शोर में दब जाती है।
आज हमारी नजर मृत युवक पर नहीं, बल्कि उस जीवित मां पर है, जिसे उसके बेटे की मौत ने अकेला कर दिया है।
कानून अपना काम करेगा। पुलिस जांच करेगी। अदालत फैसला करेगी। दोषी को सजा भी मिलेगी। लेकिन उस मां को जीवन कौन देगा—यह सवाल अभी भी हमारे सामने खड़ा है।
शायद आने वाले दिनों में प्रशासन उसके घर तक पहुंचे। शायद किसी जनप्रतिनिधि की नजर उस टूटे हुए घर पर पड़े। शायद सरकार की कोई योजना उस परिवार का सहारा बन जाए। शायद समाज उस मां के साथ खड़ा हो जाए।
लेकिन यह “शायद” कब “हकीकत” बनेगा, यही देखने वाली बात है।
क्योंकि किसी भी सरकार की असली परीक्षा बड़े-बड़े मंचों पर दिए गए भाषणों में नहीं होती। उसकी असली परीक्षा उस गरीब, अकेली और बेसहारा मां के दरवाजे पर होती है, जिसने अपना सब कुछ खो दिया है।
एक युवक की हत्या की जांच जरूरी है, अपराधी को सजा मिलना जरूरी है—लेकिन उससे भी जरूरी है कि उस हत्या से बची हुई जिंदगी को मरने के लिए अकेला न छोड़ दिया जाए।
यही इस घटना का सबसे बड़ा सवाल है।
यही हमारी पत्रकारिता का सवाल है।
और यही एक संवेदनशील समाज की जिम्मेदारी भी है।
लेखक परिचय
अशोक कुमार झा सामाजिक सरोकारों, जनसमस्याओं और लोकतांत्रिक मूल्यों से जुड़े विषयों पर निरंतर लेखन करने वाले पत्रकार एवं संपादक हैं। वे ‘रांची दस्तक’ हिंदी दैनिक के प्रधान संपादक हैं और ग्रामीण, गरीब तथा वंचित वर्गों से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता से उठाने के लिए जाने जाते हैं। उनका मानना है कि पत्रकारिता का उद्देश्य केवल सूचना देना नहीं, बल्कि समाज के सामने सच रखना, व्यवस्था से जवाब मांगना और जरूरतमंद की आवाज को मजबूती देना भी है।
Reviewed by PSA Live News
on
4:36:00 pm
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