आदिवासी संगठनों का आरोप—चर्च के प्रभाव में आयोजित कार्यक्रम को राजनीतिक रंग देने का प्रयास; कहा- आदिवासियों के नाम पर आंदोलन हुआ तो करेंगे विरोध
रांची। आदिवासी एकता महाजुटान के नाम से प्रस्तावित रैली को लेकर आदिवासी संगठनों के बीच विवाद गहरा गया है। विभिन्न आदिवासी संगठनों ने संयुक्त रूप से प्रेस बयान जारी कर आरोप लगाया है कि जिस कार्यक्रम को शुरुआत में “आदिवासी एकता महाजुटान रैली” के रूप में प्रचारित किया जा रहा था, वह अंततः कांग्रेस गठबंधन सरकार की राजनीतिक रैली में तब्दील हो गया। संगठनों का दावा है कि कार्यक्रम के स्वरूप और नाम को लेकर लगातार बदलाव हुए और 30 अगस्त तक पहुंचते-पहुंचते इसे कांग्रेस गठबंधन से जोड़ दिया गया।
संयुक्त बयान में आदिवासी संगठनों ने आरोप लगाया कि रैली के आयोजन में चर्च की भूमिका महत्वपूर्ण रही है और बाद में इसे कांग्रेस गठबंधन सरकार का राजनीतिक समर्थन प्राप्त हो गया। संगठनों ने इसे आदिवासी समाज के नाम और पहचान का राजनीतिक इस्तेमाल करार देते हुए कहा कि आदिवासी समाज के सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक मुद्दों को किसी राजनीतिक दल या धार्मिक संस्था के राजनीतिक हितों से नहीं जोड़ा जाना चाहिए।
बयान में पूर्व मंत्री बंधु तिर्की पर भी गंभीर आरोप लगाए गए हैं। संगठनों का आरोप है कि बंधु तिर्की चर्च के प्रमुख चेहरों में से एक हैं और वे चाहते हैं कि आदिवासी समाज का नेतृत्व उनके तथा चर्च के माध्यम से हो। संगठनों ने कहा कि आदिवासी समाज के लोगों को ऐसे राजनीतिक एवं सामाजिक समीकरणों को समझने की आवश्यकता है और समाज के नेतृत्व का निर्णय आदिवासी समुदाय के सामाजिक-सांस्कृतिक हितों के आधार पर होना चाहिए।
आदिवासी संगठनों ने स्पष्ट किया कि उन्हें किसी भी धार्मिक या सामाजिक समूह द्वारा अपने नाम और पहचान के साथ आंदोलन अथवा कार्यक्रम आयोजित करने पर आपत्ति नहीं है। उनका कहना है कि ईसाई, मसीही, क्रिश्चियन, विश्वासी अथवा ख्रीस्तीय समुदाय यदि अपने धार्मिक या सामाजिक मुद्दों को लेकर स्वतंत्र रूप से आंदोलन करता है, तो उस पर उन्हें कोई आपत्ति नहीं होगी। हालांकि, यदि किसी धार्मिक संगठन अथवा समूह द्वारा आदिवासी समाज के नाम पर आंदोलन या राजनीतिक कार्यक्रम आयोजित किया जाता है, तो उसका विरोध किया जाएगा।
संगठनों ने आरोप लगाया कि आदिवासी एकता के नाम पर आयोजित कार्यक्रम को राजनीतिक स्वरूप दिए जाने से आदिवासी समाज के वास्तविक मुद्दे पीछे छूट रहे हैं। उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज की पहचान, परंपरा, संस्कृति, सरना धर्मस्थल, जल-जंगल-जमीन और सामाजिक अधिकार जैसे मुद्दों पर चर्चा होनी चाहिए, न कि समाज की पहचान का इस्तेमाल किसी राजनीतिक दल के समर्थन या विरोध के लिए किया जाना चाहिए।
संयुक्त बयान में विभिन्न आदिवासी संगठनों ने रैली को “विफल” बताते हुए दावा किया कि कार्यक्रम को लेकर आदिवासी समाज में व्यापक असहमति है। हालांकि, रैली में वास्तविक भागीदारी और उसके प्रभाव का स्वतंत्र आकलन अलग-अलग स्रोतों के आधार पर ही किया जा सकेगा।
संयुक्त प्रेस बयान जारी करने वालों में मुख्य पाहन जगलाल पाहन, केंद्रीय सरना समिति के अध्यक्ष बबलू मुंडा, प्रधान महासचिव अशोक मुंडा, जनजाति सुरक्षा मंच के क्षेत्रीय संयोजक संदीप उरांव, झारखंड आदिवासी विकास समिति धुर्वा के अध्यक्ष मेघा उरांव, मुखिया संघ के अध्यक्ष सोमा उरांव तथा सन्नी टोप्पो शामिल हैं।
आदिवासी संगठनों ने कहा कि आदिवासी समाज के नाम पर भविष्य में होने वाले किसी भी कार्यक्रम को लेकर वे अपनी सामाजिक एवं सांस्कृतिक पहचान की रक्षा के लिए आवाज उठाते रहेंगे। साथ ही उन्होंने राजनीतिक दलों और विभिन्न सामाजिक-धार्मिक संगठनों से आदिवासी समाज की पहचान एवं भावनाओं का राजनीतिक इस्तेमाल नहीं करने की अपील की।
Reviewed by PSA Live News
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8:54:00 pm
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