संपादकीय
क्या झारखंड की छवि को देश और दुनिया के सामने जानबूझकर खराब करने की कोई साजिश चल रही है? या फिर वास्तव में झारखंड आज उसी दौर से गुजर रहा है, जिसकी तस्वीर अलग-अलग घटनाओं के माध्यम से देश और दुनिया तक पहुंच रही है? यह सवाल आज इसलिए महत्वपूर्ण हो गया है, क्योंकि पिछले कुछ समय से झारखंड की चर्चा विकास, शिक्षा, रोजगार, खेल और प्राकृतिक संपदा के बजाय पेपर लीक, भर्ती परीक्षाओं में कथित अनियमितता, साइबर अपराध, ठगी, माफिया और भ्रष्टाचार जैसी खबरों को लेकर अधिक होती दिखाई दे रही है। सवाल यह नहीं है कि इन घटनाओं को छिपाया जाए। सवाल यह है कि क्या कुछ घटनाओं के आधार पर पूरे झारखंड की पहचान तय की जा सकती है? और उससे भी बड़ा सवाल यह है कि यदि ऐसी घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं, तो क्या इन्हें केवल झारखंड की छवि खराब करने की साजिश कहकर नजरअंदाज कर दिया जाए?
झारखंड की पहचान केवल आज की कुछ नकारात्मक घटनाओं से नहीं बनती। यह वह धरती है, जिसने बिरसा मुंडा जैसे महान जननायक को जन्म दिया। यह सिद्धू-कान्हू, चांद-भैरव, फूलो-झानो और उन असंख्य आंदोलनकारियों की धरती है, जिन्होंने अपने अधिकारों, जल, जंगल और जमीन के लिए संघर्ष किया। यह मेहनतकश आदिवासियों, किसानों, मजदूरों, युवाओं और उन परिवारों की धरती है, जिन्होंने सीमित संसाधनों के बावजूद अपने बच्चों को पढ़ाने और आगे बढ़ाने का सपना देखा है। झारखंड के हजारों युवा ऐसे हैं जो दिन-रात पढ़ाई करते हैं, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं और कई बार आर्थिक मजबूरियों के कारण मजदूरी या छोटे-मोटे काम करने के बाद भी अपनी पढ़ाई जारी रखते हैं। इसलिए झारखंड को केवल अपराध और भ्रष्टाचार की खबरों से पहचानना उसके करोड़ों मेहनतकश लोगों के साथ अन्याय होगा।
लेकिन दूसरी तरफ यह भी सच है कि राज्य की छवि केवल इतिहास और भावनाओं से नहीं बनती। वर्तमान में जो कुछ हो रहा है, उससे भी राज्य की पहचान बनती है। आज झारखंड में छात्र आंदोलन और जेपीएससी-जेएसएससी से जुड़ी विवादित परीक्षाओं का मामला लगातार चर्चा में है। परीक्षा प्रक्रिया को लेकर उठे सवालों ने छात्रों के भीतर गहरी नाराजगी और अविश्वास पैदा किया है। छात्रों का कहना है कि यदि परीक्षा प्रक्रिया में गड़बड़ी हुई है तो उसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए। दूसरी तरफ उसी परीक्षा के माध्यम से नियुक्त हुए अभ्यर्थियों का कहना है कि उन्होंने अपनी मेहनत से परीक्षा पास की है और यदि कहीं अनियमितता हुई भी है तो उसका खामियाजा उन लोगों को क्यों भुगतना पड़े, जिन्होंने स्वयं कोई अपराध नहीं किया है।
यहीं से पूरा मामला और अधिक जटिल हो जाता है। एक ओर बेरोजगार छात्र अपने भविष्य और मेहनत के साथ न्याय की मांग कर रहे हैं, तो दूसरी ओर नौकरी प्राप्त अभ्यर्थी अपनी नियुक्ति और भविष्य की सुरक्षा के लिए संघर्ष कर रहे हैं। सरकार द्वारा नियुक्तियों को रद्द किए जाने के बाद नियुक्त अभ्यर्थियों का सड़क पर उतरना और न्यायालय की शरण लेना इस बात का संकेत है कि समस्या कितनी गंभीर हो चुकी है। मामला उच्च न्यायालय तक पहुंचा और न्यायिक प्रक्रिया में सरकार के निर्णय पर रोक जैसी स्थिति सामने आई। अब परिस्थितियां ऐसी बनती दिखाई दे रही हैं कि आंदोलनकारी छात्र हों या नियुक्त अभ्यर्थी, दोनों ही अंततः उस व्यवस्था से सवाल कर रहे हैं जिसने उन्हें आमने-सामने खड़ा कर दिया। दोनों पक्षों की ओर से स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच की मांग सामने आना अपने आप में सरकार और पूरी भर्ती व्यवस्था के लिए गंभीर संकेत है।
यहां सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या बेरोजगार युवा और नौकरी पाने वाले युवा वास्तव में एक-दूसरे के दुश्मन हैं? क्या एक छात्र की न्याय की मांग दूसरे छात्र की नौकरी छीनने की मांग होनी चाहिए? और क्या किसी नियुक्त अभ्यर्थी की नौकरी बचाने की कोशिश का अर्थ यह है कि वह परीक्षा में हुई कथित गड़बड़ी का समर्थन करता है? शायद नहीं। दोनों पक्षों की अपनी पीड़ा है और दोनों अपने भविष्य को लेकर चिंतित हैं। वास्तविक जिम्मेदारी उस व्यवस्था की है, जो ऐसी स्थिति पैदा होने से पहले परीक्षा प्रक्रिया को इतना पारदर्शी और विश्वसनीय नहीं बना सकी कि किसी को सवाल उठाने का अवसर ही न मिले। यदि परीक्षा में कोई अनियमितता हुई है तो दोषी व्यक्ति तक पहुंचना चाहिए, लेकिन बिना व्यक्तिगत दोष सिद्ध हुए हजारों युवाओं के भविष्य को अनिश्चितता में डालना भी न्यायपूर्ण रास्ता नहीं हो सकता।
इसी बीच सेना में भर्ती कराने के नाम पर ठगी करने वाले लोगों की गिरफ्तारी जैसी घटनाएं भी सामने आती हैं। सेना में भर्ती होना देश के लाखों युवाओं का सपना होता है। जब कोई व्यक्ति इसी सपने को ठगी का माध्यम बनाता है तो वह केवल आर्थिक अपराध नहीं करता, बल्कि युवाओं के विश्वास के साथ भी खिलवाड़ करता है। ऐसे मामलों में पुलिस और सेना की संबंधित एजेंसियों द्वारा कार्रवाई जरूरी है, लेकिन उससे भी अधिक जरूरी है कि ऐसे फर्जी नेटवर्क की जड़ तक पहुंचा जाए। यह पता लगाया जाए कि युवाओं को नौकरी दिलाने का झांसा देने वाले लोग किस नेटवर्क के माध्यम से काम कर रहे हैं, उन्हें किस प्रकार की जानकारी और संरक्षण मिलता है और वे बेरोजगार युवाओं तक कैसे पहुंचते हैं।
झारखंड की चर्चा होते ही जामताड़ा का नाम भी अक्सर साइबर अपराध के संदर्भ में लिया जाता है। साइबर ठगी के अनेक मामलों के कारण जामताड़ा की एक नकारात्मक पहचान राष्ट्रीय स्तर पर बनी है। लेकिन क्या जामताड़ा ही झारखंड है? क्या वहां रहने वाला हर व्यक्ति साइबर अपराधी है? निश्चित रूप से नहीं। किसी क्षेत्र में अपराध का नेटवर्क होना उस क्षेत्र के प्रत्येक नागरिक को अपराधी नहीं बना देता। इसी तरह कोयला, बालू और अन्य खनिज संसाधनों से जुड़े अवैध कारोबार तथा माफिया गतिविधियों की खबरें भी झारखंड की छवि को प्रभावित करती हैं। लेकिन कुछ अपराधियों और माफिया तत्वों की मौजूदगी को पूरे राज्य के चरित्र से जोड़ देना भी उचित नहीं है।
फिर भी सरकार और प्रशासन इस सवाल से बच नहीं सकते कि ऐसी गतिविधियों को रोकने के लिए पर्याप्त प्रभावी व्यवस्था क्यों नहीं बन पाती। यदि अवैध खनन है तो उस पर कार्रवाई कौन करेगा? यदि माफिया तंत्र है तो उसके पीछे किसका संरक्षण है? यदि साइबर अपराध का नेटवर्क लगातार सक्रिय है तो उसकी जड़ें क्यों नहीं काटी जा रही हैं? यदि भर्ती परीक्षाओं में बार-बार सवाल उठते हैं तो परीक्षा प्रणाली को पूरी तरह सुरक्षित और पारदर्शी क्यों नहीं बनाया जा रहा है? यदि सेना, पुलिस या दूसरी सरकारी नौकरियों के नाम पर ठगी हो रही है तो युवाओं को समय रहते जागरूक करने के लिए प्रभावी अभियान क्यों नहीं चलाया जाता? इन सवालों के जवाब केवल प्रशासनिक बयान से नहीं, बल्कि ठोस कार्रवाई से मिलने चाहिए।
आज सोशल मीडिया के दौर में किसी एक घटना को राज्य की पहचान बना देना बहुत आसान हो गया है। एक साइबर ठगी की खबर सामने आती है तो पूरा क्षेत्र चर्चा में आ जाता है। किसी परीक्षा में अनियमितता की खबर आती है तो पूरे राज्य की शिक्षा और भर्ती व्यवस्था पर सवाल उठने लगते हैं। किसी माफिया की गिरफ्तारी होती है तो राज्य की कानून-व्यवस्था चर्चा में आ जाती है। इसके विपरीत झारखंड के हजारों ऐसे युवा, जो ईमानदारी से पढ़ाई कर रहे हैं, मेहनत कर रहे हैं, प्रतियोगी परीक्षाओं में सफल हो रहे हैं, खेल के क्षेत्र में नाम कमा रहे हैं या देश के विभिन्न हिस्सों में अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन कर रहे हैं, उनकी खबरें उतनी प्रमुखता से सामने नहीं आतीं। यही मीडिया और समाज दोनों के सामने एक बड़ी चुनौती है। अपराध खबर बनता है, लेकिन ईमानदारी अक्सर खबर नहीं बनती। घोटाला सुर्खियां बनता है, लेकिन सामान्य रूप से ईमानदारी से चलती व्यवस्था सुर्खी नहीं बनती।
इसलिए यह कहना कि झारखंड की नकारात्मक छवि केवल किसी साजिश का परिणाम है, बिना ठोस प्रमाण के सही नहीं होगा। लेकिन यह सवाल उठाना भी जरूरी है कि क्या कुछ शक्तियां वास्तव में झारखंड की नकारात्मक छवि को बढ़ावा देकर राजनीतिक, आर्थिक या अन्य हित साधने का प्रयास कर रही हैं? यदि ऐसी कोई संगठित कोशिश है तो उसकी जांच होनी चाहिए। फर्जी खबरें कौन फैला रहा है, आधी-अधूरी सूचनाओं को किस उद्देश्य से फैलाया जा रहा है और क्या सोशल मीडिया के माध्यम से राज्य की छवि को नुकसान पहुंचाने का कोई सुनियोजित प्रयास हो रहा है—इन सभी पहलुओं की जांच की जा सकती है। लेकिन इसके साथ हमें अपनी कमियों को भी स्वीकार करना होगा। हर नकारात्मक खबर को साजिश बताकर वास्तविक समस्याओं से आंखें मूंद लेना किसी भी राज्य के हित में नहीं होगा।
झारखंड के सामने आज सबसे बड़ी चुनौती केवल बेरोजगारी नहीं है, बल्कि व्यवस्था के प्रति युवाओं का टूटता विश्वास है। जब कोई युवा वर्षों तक मेहनत करता है, अपने परिवार की आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करता है और फिर उसे परीक्षा की निष्पक्षता पर ही संदेह होने लगता है, तो उसके भीतर केवल निराशा नहीं पैदा होती, बल्कि पूरी व्यवस्था के प्रति अविश्वास पैदा होता है। यही अविश्वास आगे चलकर आंदोलन, संघर्ष और सामाजिक तनाव का कारण बन सकता है। इसलिए सरकार को केवल आंदोलन समाप्त कराने की कोशिश नहीं करनी चाहिए, बल्कि उस कारण को समाप्त करना चाहिए जिसके कारण युवा सड़क पर उतरने को मजबूर होते हैं।
झारखंड को अपनी छवि किसी विज्ञापन या प्रचार के माध्यम से बदलने की आवश्यकता नहीं है। यदि भर्ती परीक्षाएं पारदर्शी हों, नियुक्ति प्रक्रिया विश्वसनीय हो, परीक्षा में किसी भी प्रकार की गड़बड़ी पर समयबद्ध जांच हो, दोषियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई हो, निर्दोष अभ्यर्थियों के हितों की रक्षा हो, साइबर अपराध के नेटवर्क पर प्रभावी कार्रवाई हो, बालू और कोयले के अवैध कारोबार पर रोक लगे और प्रशासनिक व्यवस्था में जवाबदेही सुनिश्चित हो, तो झारखंड की छवि अपने आप बदलेगी। तब देश और दुनिया झारखंड को केवल अपराध की खबरों से नहीं, बल्कि उसके विकास, प्रतिभा और मेहनतकश लोगों से पहचानेगी।
जिस धरती को बिरसा मुंडा की धरती कहा जाता है, उसकी पहचान किसी साइबर ठग से नहीं हो सकती। जिस धरती ने सिद्धू-कान्हू जैसे क्रांतिकारियों को जन्म दिया, उसकी पहचान किसी माफिया से नहीं हो सकती। जिस राज्य के युवा सीमित साधनों में भी देश की कठिन प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता हासिल करते हैं, उसकी पहचान केवल पेपर लीक या भर्ती विवाद से नहीं हो सकती। लेकिन इसके लिए केवल गौरवशाली इतिहास का स्मरण पर्याप्त नहीं है। इतिहास हमें गौरव देता है, लेकिन वर्तमान हमें जिम्मेदारी देता है।
इसलिए आज झारखंड के सामने सवाल केवल यह नहीं है कि उसकी छवि कौन खराब कर रहा है। उससे बड़ा सवाल यह है कि झारखंड अपनी व्यवस्था को ऐसा क्यों नहीं बना पा रहा, जिससे नकारात्मक खबरें उसकी पहचान न बनें। यदि कोई साजिश है तो उसे बेनकाब करना सरकार की जिम्मेदारी है। यदि व्यवस्था में कमजोरी है तो उसे दूर करना भी सरकार की जिम्मेदारी है। यदि भ्रष्टाचार है तो दोषियों पर कार्रवाई होनी चाहिए। यदि युवाओं के साथ अन्याय हुआ है तो उन्हें न्याय मिलना चाहिए। और यदि कहीं निर्दोष युवाओं की मेहनत दांव पर लगी है तो उनके भविष्य की रक्षा भी उतनी ही जरूरी है।
झारखंड को यह तय करना होगा कि उसकी पहचान कुछ अपराधियों, कुछ माफिया तत्वों, कुछ घोटालों और कुछ विवादित परीक्षाओं से होगी या उन करोड़ों मेहनतकश लोगों से, जो इस राज्य की असली ताकत हैं। दुनिया झारखंड को किस नजर से देखती है, यह केवल मीडिया तय नहीं करता। सरकार की नीतियां, प्रशासन की कार्यशैली, कानून का राज, युवाओं का भविष्य और समाज का चरित्र मिलकर किसी राज्य की वास्तविक छवि बनाते हैं।
इसलिए शायद आज सबसे बड़ा विचारणीय प्रश्न यही है—क्या हम झारखंड की खराब छवि के लिए केवल किसी बाहरी साजिश को जिम्मेदार ठहराते रहेंगे, या अपनी व्यवस्था को इतना मजबूत बनाएंगे कि झारखंड की पहचान माफिया, फर्जीवाड़े और भ्रष्टाचार से नहीं, बल्कि न्याय, पारदर्शिता, संघर्ष, मेहनत और विकास से हो?
झारखंड को दुनिया के सामने अपनी महानता साबित करने की जरूरत नहीं है। उसे केवल अपनी व्यवस्था को इतना मजबूत करना है कि दुनिया स्वयं कहे—यह वही झारखंड है, जिसने संघर्ष की परंपरा से जन्म लिया, अपने अधिकारों के लिए लड़ना सीखा और अब न्याय, पारदर्शिता तथा विकास के रास्ते पर आगे बढ़ रहा है।
— अशोक कुमार झा
वरिष्ठ पत्रकार, सामाजिक, प्रशासनिक एवं राजनीतिक विश्लेषक
प्रधान संपादक : रांची दस्तक एवं PSA लाइव न्यूज
संस्थापक सह राष्ट्रीय अध्यक्ष : अखिल भारतीय उपभोक्ता एवं मानवाधिकार संरक्षण परिषद
संस्थापक सह राष्ट्रीय अध्यक्ष : सर्वजन विकास पार्टी
पिछले तीन दशकों से अधिक समय से पत्रकारिता के क्षेत्र में लेखन तथा विभिन्न राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय विषयों पर विश्लेषण।
Reviewed by PSA Live News
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8:18:00 pm
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