श्रेष्ठ कर्म ही सत्पुरुष का सच्चा धन, नए संकल्पों से होगी सुखमय नई सृष्टि की रचना : ब्रह्माकुमारी निर्मला बहन
रांची। ब्रह्माकुमारी संस्थान, चौधरी बगान, हरमू रोड में आयोजित आध्यात्मिक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए ब्रह्माकुमारी निर्मला बहन ने कहा कि सत्पुरुष का सबसे बड़ा धन उनके श्रेष्ठ कर्म होते हैं। व्यक्ति अपने सद्व्यवहार, विनम्रता, संयम और परोपकार के माध्यम से निरंतर पुण्य अर्जित करता है, जिसके फलस्वरूप उसे परमात्मा से अक्षय सुख और शांति की प्राप्ति होती है।
उन्होंने कहा कि नई और सुखमय सृष्टि की रचना नए संकल्पों और सकारात्मक विचारों से होती है। ये दिव्य विचार संसार के रचयिता परमपिता परमात्मा से प्राप्त होते हैं। आज का मानव अनेक पुराने, नकारात्मक और बोझिल विचारों तथा जटिल समस्याओं से घिरा हुआ है, जिसके कारण उसका जीवन कलह, क्लेश और अशांति से भर गया है। यह स्थिति तभी बदल सकती है जब मनुष्य स्वयं से ऊपर उठकर, संसार के कल्याण के लिए कुछ नया और श्रेष्ठ सोचना आरंभ करेगा।
संकल्पों की दिशा से तय होता है समाज और मानव का भविष्य
ब्रह्माकुमारी निर्मला बहन ने स्पष्ट किया कि संकल्पों की प्रकृति ही परिवर्तन की दिशा तय करती है। यदि नए संकल्प सामाजिक हों तो समाज का उत्थान होता है, यदि राजनीतिक हों तो शासन व्यवस्था सुदृढ़ होती है और यदि आध्यात्मिक हों तो मानव आत्मा का उत्थान सुनिश्चित होता है। यही कारण है कि आध्यात्मिक जागरण को जीवन का आधार बनाना आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
सृष्टि चक्र और आत्मा का रहस्य
उन्होंने कहा कि ब्रह्मा को नई सृष्टि का रचयिता कहा गया है। परमात्मा ब्रह्मा, विष्णु और शंकर के माध्यम से सृष्टि की स्थापना, पालन और पतित सृष्टि के विनाश की प्रक्रिया को संचालित करते हैं। यह भ्रांति है कि महाविनाश के बाद सब कुछ समाप्त हो जाता है। वास्तव में मनुष्य आत्मा स्वयं एक बीज है, जो नए शरीरों की उत्पत्ति का कारण बनती है। महाविनाश के पश्चात देवी संप्रदाय के कुछ श्रेष्ठ आत्माएं शेष रहती हैं, जो योगबल और पवित्रता के आधार पर नई सृष्टि का विस्तार करती हैं।
ईश्वरीय ज्ञान से बदलता है जीवन
निर्मला बहन ने कहा कि पिताश्री ब्रह्मा अपने ज्ञानयुक्त संकल्पों से मानव के संस्कारों को श्रेष्ठ बनाते हैं। ब्रह्मा मुख से ईश्वरीय ज्ञान को सुनकर मनुष्य का जीवन पूरी तरह बदल जाता है। उसका आचरण संयमित, मर्यादित और संस्कारित हो जाता है। यही परिवर्तन व्यक्ति को सच्चे अर्थों में सुखी और शांत बनाता है।
पाँच हजार वर्ष पूर्व स्वर्ग समान था भारत
उन्होंने कहा कि आज से लगभग पाँच हजार वर्ष पहले हमारा देश स्वर्ग तुल्य था। उस समय पूरी सृष्टि सतोप्रधान थी और जीवन में दुख, अशांति या कलह का नामोनिशान नहीं था। परमात्मा ने ब्रह्मा के माध्यम से उस सुखमय सृष्टि की स्थापना की थी। प्रत्येक कल्प के अंत के बाद नए सिरे से सतयुग की रचना होती है और आज वही परिवर्तन का काल पुनः चल रहा है।
पवित्रता ही सुख और शांति की जननी
कार्यक्रम के अंत में उन्होंने कहा कि आने वाला युग आध्यात्मिक युग होगा। पवित्रता ही सुख और शांति की जननी है और इसकी रक्षा करना हर मनुष्य का प्रथम कर्तव्य है। जब मानव अपने विचारों, कर्मों और जीवन में पवित्रता को धारण करेगा, तभी सच्चे अर्थों में एक सुंदर, शांत और सुखमय विश्व का निर्माण संभव हो सकेगा।
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3:34:00 pm
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