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श्रीवैकुण्ठ एकादशी महोत्सव की तैयारी पूरी ,वैकुण्ठ द्वार सज कर हुआ तैयार


 रांची। धनुर्मास - श्रीगोदा रंगनाथ व्रत के मध्य श्रीवैकुण्ठोत्सव आज 29 दिसम्बर से शुरु । सहस्त्रनाम अर्चना अनुष्ठान चारों  दिन चार -चार पाली में होगी । सहस्त्रार्चन में  पाँच सौ से अधिक  संख्या में यजमान  शामिल होंगें  । अभी  बुकिंग चालु है । 

भक्तों के अभीष्ट फलदाता भगवान श्रीलक्ष्मी वेंकटेश्वर अर्चना प्रिय हैं ।अष्टोत्तर पुष्प - अर्चना में भगवान की 108 नाम लेकर भगवान के श्रीचरणों में पुष्प एवं तुलसीदल अर्पित किया जाता है और इससे भगवान सहज ही प्रसन्न हो जाते हैं। जब सहस्त्रनाम अर्चना के माध्यम से भगवान के एक हजार आठ नाम लेकर , 1008 बार पुष्प समर्पित किए जाते हैं, तो भगवान की प्रसन्नता का फिर क्या कहना । विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ  भगवान की सर्वश्रेष्ठ आराधना है और विष्णु सहस्त्रनाम अर्चना भगवान की सर्वोत्तम पूजन विधि है। यह कहना है जगदगुरु रामानुजाचार्य श्रीस्वामी अनिरुद्धाचार्यजी महाराज का ।

 श्रीस्वामी जी ने आज प्रातः श्रीलक्ष्मी वेंकटेश्वर मंदिर के प्रांगण में श्रीगोदांबा देवी की आराधना के बाद भक्तों को संबोधित कर रहे थे। श्रीस्वामी जी ने कहा कि अभी धनुर्मास चल रहा है। धनुर्मास के महीने में श्रीगोदांबा देवी बतलाती हैं कि भगवान की भक्ति किस तरह की जाती है ! शरणागति का क्या महत्व है ! भगवान् को प्राप्त करने का कैसी उत्कट इच्छा होनी चाहिए !  त्याग,समर्पण और उपासना के महत्व को समझाती है । श्री गोदा देवी चरित का बड़ा ही विशद वर्णन है ।

 भगवान प्रसन्न होकर भक्ति को ही अंगीकार कर लेते हैं। श्रीस्वामी अनिरुद्धाचार्य जी ने कहा कि द्वादश आलवारों में  श्रीगोदांबा देवी अकेली महिला आलवार है और इनका नाम लेने मात्र से सभी आलवार प्रसन्न हो जाते हैं। आलवार का अर्थ है - भगवान की भक्ति रस में डूबा हुआ । श्रीवैकुंठ एकादशी के शुभ अवसर पर 29 दिसंबर से 1 जनवरी 2026 तक विष्णु सहस्त्रनाम अर्चना का आयोजन किया जा रहा है। श्रीस्वामी जी ने भक्तों से आवाहन किया कि इस अनमोल अवसर का लाभ जरूर उठाएं।


इधर मंदिर में भगवान का सुप्रभातम , मंगलाशासन, नित्याराधन आदि संपादन करके महाआरती हुई। पोंगल, खीर, चटनी, फल और मेवे का बाल भोग लगा। फिर तिरूप्पावै  प्रबंधम्  का अनुसंधान किया गया। श्रीगोदा स्तुति ,श्रीस्तुति,भूस्तुति और गोदा रंगनाथ का मंगलाशासन हुआ। भगवान को आज धनुर्मास व्रत के तेरहवें तिन 'पुल्लिन् वाय कीण्डानै, अर्थात दोस्तो के संहारी नाम का पोशाक धारण कराया । भगवान् को सर्दी से बचने के लिए गर्म शाॅल और औषधि का पान कराया गया। 

मुख्य रूप से वृंदावन से श्री गुरुदेव के साथ पधारे गोविंद दास स्वामी जी और सर्वश्री राम अवतार नारसरिया अनूप अग्रवाल गौरी शंकर साबू प्रदीप नरसरिया  श्यामानंद झा ओमप्रकाश गरोदिया रंजन सिंह आदि की मुख्य भूमिका रही।

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