✍️ लेखक : अशोक कुमार झा
(एडिटर – Ranchi Dastak / PSA Live News)
यह मेयर का नहीं, लोकतंत्र की बहाली का चुनाव है
रांची नगर निगम चुनाव–2026 केवल एक शहरी निकाय का चुनाव नहीं है। यह झारखंड की राजधानी की राजनीतिक चेतना, प्रशासनिक क्षमता और लोकतांत्रिक स्वास्थ्य की परीक्षा है। लगभग तीन वर्षों तक रांची बिना निर्वाचित नगर सरकार के रही। इस दौरान जनता ने देखा कि अफ़सरशाही कैसे बिना जवाबदेही के शासन करती है और कैसे जनप्रतिनिधियों के बिना शहर व्यवस्था के भरोसे छोड़ दिया जाता है।
अब जनता के सामने सिर्फ़ उम्मीदवार नहीं, बल्कि सवाल खड़े हैं—
क्या रांची को अब ऐसा नेतृत्व मिलेगा जो शहर को काग़ज़ी योजनाओं से निकालकर ज़मीनी बदलाव की राह पर ले जाए?
नगर निगम, इतिहास और जनता का असंतोष
1979 में स्थापित रांची नगर निगम आज झारखंड की सबसे बड़ी नगर निकाय है। राजधानी होने के बावजूद रांची—
गंदगी, जाम, जल संकट, सीवरेज विफलता, अनियोजित विस्तार का प्रतीक बन चुकी है।
यह स्थिति किसी एक सरकार या एक अफ़सर की नहीं, बल्कि लगातार उपेक्षा, राजनीतिक स्वार्थ और सिस्टम की जड़ता का परिणाम है।
रांची स्मार्ट सिटी घोषित हुई। करोड़ों रुपये आए। लेकिन ज़मीनी सच्चाई यह है कि—
✔ सड़कें उखड़ी हैं
✔ फुटपाथों पर अतिक्रमण है
✔ बारिश में शहर जलमग्न हो जाता है
✔ कूड़ा प्रबंधन ध्वस्त है
✔ पेयजल सप्लाई अस्थिर है
जनता पूछ रही है— “अगर यही स्मार्ट सिटी है, तो आम आदमी की ज़िंदगी इतनी कठिन क्यों है?”
2026 का चुनाव क्यों ऐतिहासिक है
यह चुनाव इसलिए ऐतिहासिक है क्योंकि—
लगभग 3 साल की देरी के बाद चुनाव हो रहे हैं
डिप्टी मेयर की चुनाव प्रक्रिया बदली है
भाजपा की शहरी पकड़ को पहली बार गंभीर चुनौती मिल रही है और गैर-भाजपा दल संगठित होकर मैदान में हैं ।
मेयर पद के लिए 19 नामांकन हुए, 8 वापस हुए और अब मैदान में 11 उम्मीदवार हैं।
लेकिन व्यावहारिक राजनीति में मुकाबला दो नामों में सिमट गया है—
🔹 रोशनी खलखो – भाजपा समर्थित
🔹 रमा खलखो – झामुमो–कांग्रेस समर्थित
यह लड़ाई दो महिलाओं की नहीं, बल्कि दो राजनीतिक दृष्टियों की है— संघर्ष बनाम अनुभव, संगठन बनाम गठबंधन और सत्ता बनाम विपक्ष की।
रोशनी खलखो – अदालत से जनता तक
रोशनी खलखो केवल उम्मीदवार नहीं हैं। वे उस संघर्ष का चेहरा हैं जिसने चुनाव को ही संभव बनाया। जब सरकार और चुनाव आयोग ने नगर निगम चुनावों को टाल दिया, तब उन्होंने हाईकोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया।
➡️ न्यायालय की सख्ती के बाद ही यह चुनाव संभव हुआ।
उनका नैरेटिव साफ़ है— “मैंने लोकतंत्र को वापस दिलाया, अब शहर को बदलूँगी।”
भाजपा ने उन्हें समर्थन देकर यह संदेश दिया है कि वह संघर्षशील और सिस्टम से लड़ने वाले चेहरे को आगे बढ़ा रही है।
रमा खलखो – अनुभव और सत्ता-विरोधी उम्मीद
रमा खलखो 2013 से पहले रांची की मेयर रह चुकी हैं। उनका कार्यकाल— आदिवासी प्रतिनिधित्व, प्रशासनिक संतुलन और गठबंधन राजनीति का प्रतीक रहा है।
2013 में आशा लकड़ा से हार के बाद भी वे संगठन में सक्रिय रहीं। अब आशा लकड़ा के मैदान से बाहर होने के बाद रमा खलखो के सामने एक ऐतिहासिक मौका है।
उनका नैरेटिव है— “अनुभव ही शहर को दिशा देगा।”
वोट बैंक का समाजशास्त्र
रांची का मतदाता अब केवल जाति या पार्टी नहीं, बल्कि—काम, ईमानदारी, सुविधा और पारदर्शिता देखना चाहता है।
साथ ही अलग अलग वर्गों की अपनी अलग अलग उम्मीदें भी हैं। जैसे आदिवासी समाज की उम्मीद है सम्मान और विकास, मुस्लिम को चाहिए सुरक्षा और भागीदारी, मध्यम वर्ग को चाहिए सफाई और सुव्यवस्थित ट्रैफिक व्यवस्था और युवाओं को चाहिए रोजगार और डिजिटल सिस्टम।
ऐसे में रांची शहर को एक ऐसे मेयर की जरूरत है जो उम्मीदवार इन सबको जोड़ पाएगा।
स्मार्ट सिटी बनाम ज़मीनी हकीकत
स्मार्ट सिटी के नाम पर करोड़ों खर्च जरूर हो रहे हैं पर हकीकत में सड़कें आज भी टूटी है, शहर की ज्यादातर नालियाँ जाम है, जिसका पर्दाफाश तब हो जाता है जब छोटी सी बारिश में पूरी शहर डूब जाती है।
इसलिए जनता कह रही है— “काग़ज़ पर विकास बहुत हुआ, ज़मीन पर कुछ नहीं।”
भ्रष्टाचार, अफ़सरशाही और सिस्टम
नगर निगम की आज की हकीकत यह है कि यह सिर्फ टेंडर घोटाले, फर्जी बिल और ठेकेदार–अफ़सर गठजोड़ का अड्डा मात्र बन कर रह गया है।
ऐसे में जनता अब ऐसा मेयर चाहती है, जो अफ़सरों से नहीं, जनता से डरे।
वार्ड से सत्ता तक – डिप्टी मेयर का नया रास्ता
अब नए चुनाव प्रक्रिया के तहत डिप्टी मेयर पार्षदों में से कोई एक चुना जाएगा, जिस कारण हर वार्ड सत्ता की पहली सीढ़ी बन गया है। जिसका नतीजा आज यह है कि कई वार्डों में कई पुराने दोस्त अब आमने–सामने हो गए हैं
कैसा हो रांची का नया मेयर ?
अब रांची को चाहिए ऐसा मेयर जो फील्ड में लोगों के बीच रहने वाला हो, फाइल नहीं, फैसले करने वाला नेता हो, भ्रष्टाचार से लड़ने वाला योद्धा हो और जनता से सीधा जुड़ा प्रशासक भी हो।
यह चुनाव कुर्सी का नहीं, किस्मत का है
वास्तव में रांची नगर निगम चुनाव–2026 सिर्फ सत्ता का नहीं, बल्कि शहर की आत्मा का चुनाव है। परंतु असली हकीकत क्या है और शहर की जनता आखिर क्या चाहती है वह तभी तय हो पाएगा जब 23 फरवरी को वोट पड़ेगा और 27 फरवरी को उसका फैसला आ जाएगा।
तभी जाकर यह तय हो पाएगा कि आखिर अतीत चलेगा या भविष्य आएगा, सिस्टम जमेगा या बदलेगा और अंततः राजनीति जीतेगी या जनता।
Reviewed by PSA Live News
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7:38:00 pm
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