क्या प्रेस से दूरी लोकतंत्र को कमजोर करती है या बदलते समय में संवाद के नए माध्यम पर्याप्त हैं?
लेखक : अशोक कुमार झा
प्रधान संपादक – रांची दस्तक एवं PSA Live News
स्वतंत्र पत्रकार, सामाजिक-राजनीतिक विश्लेषक एवं जनसरोकारों के मुद्दों पर नियमित टिप्पणीकार
भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत उसकी जनता है और जनता की आवाज़ को सत्ता तक पहुंचाने का सबसे महत्वपूर्ण माध्यम स्वतंत्र मीडिया है। मीडिया और सरकार के बीच संवाद का सबसे प्रभावी औजार प्रेस कॉन्फ्रेंस को माना जाता रहा है। प्रेस कॉन्फ्रेंस केवल सूचनाओं के आदान-प्रदान का मंच नहीं होती, बल्कि यह सत्ता से सवाल पूछने, नीतियों की पड़ताल करने और जनता के प्रति सरकार की जवाबदेही सुनिश्चित करने की लोकतांत्रिक प्रक्रिया का अभिन्न हिस्सा होती है।
हाल के दिनों में सोशल मीडिया पर एक तस्वीर तेजी से वायरल हुई, जिसमें विभिन्न भारतीय प्रधानमंत्रियों द्वारा की गई प्रेस कॉन्फ्रेंसों की संख्या दर्शाई गई है। इस तस्वीर के अनुसार पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने 144, जवाहरलाल नेहरू ने 75, राजीव गांधी ने 62, लाल बहादुर शास्त्री ने 56, अटल बिहारी वाजपेयी ने 55, इंदिरा गांधी ने 42, पी.वी. नरसिम्हा राव ने 40 और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शून्य प्रेस कॉन्फ्रेंस की हैं।
यह आंकड़ा अपने आप में एक गंभीर बहस को जन्म देता है। प्रश्न यह है कि क्या वास्तव में लोकतंत्र में प्रेस कॉन्फ्रेंसों की संख्या किसी सरकार की लोकतांत्रिक प्रतिबद्धता का पैमाना हो सकती है? या फिर बदलते समय में संवाद के नए माध्यमों ने पारंपरिक प्रेस कॉन्फ्रेंसों का स्थान ले लिया है? इस बहस को राजनीतिक पूर्वाग्रहों से ऊपर उठकर निष्पक्षता से देखने की आवश्यकता है।
प्रेस कॉन्फ्रेंस का लोकतांत्रिक महत्व
लोकतंत्र में सत्ता जनता की होती है और सरकार जनता की प्रतिनिधि मात्र होती है। ऐसे में सरकार का दायित्व है कि वह अपने निर्णयों, नीतियों और विफलताओं के बारे में जनता को जानकारी दे। प्रेस कॉन्फ्रेंस में पत्रकार सीधे सवाल पूछते हैं और सरकार को तत्काल उत्तर देना पड़ता है। यही प्रक्रिया जवाबदेही को मजबूत बनाती है।
अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस और अन्य विकसित लोकतंत्रों में नियमित प्रेस ब्रीफिंग और प्रेस कॉन्फ्रेंस की परंपरा रही है। वहां प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति कठिन सवालों से बचने के बजाय उनका सामना करते हैं। इससे जनता का विश्वास बढ़ता है और लोकतांत्रिक संस्थाएं मजबूत होती हैं।
भारत में भी जवाहरलाल नेहरू से लेकर अटल बिहारी वाजपेयी और मनमोहन सिंह तक पत्रकारों के साथ खुला संवाद लोकतांत्रिक संस्कृति का हिस्सा रहा है।
नरेंद्र मोदी और संवाद का बदलता मॉडल
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के समर्थक तर्क देते हैं कि संवाद का स्वरूप बदल गया है। उनका कहना है कि मोदी ने पारंपरिक प्रेस कॉन्फ्रेंस के बजाय सीधे जनता से संवाद का मॉडल अपनाया है।
"मन की बात", सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, जनसभाएं, डिजिटल कार्यक्रम, वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग और सरकारी पोर्टलों के माध्यम से प्रधानमंत्री लगातार जनता तक अपनी बात पहुंचाते रहे हैं।
उनका यह भी कहना है कि आज के दौर में सूचना प्रौद्योगिकी ने संचार के नए रास्ते खोल दिए हैं। इसलिए केवल प्रेस कॉन्फ्रेंस की संख्या को लोकतांत्रिक जवाबदेही का एकमात्र पैमाना नहीं माना जाना चाहिए।
लेकिन आलोचकों का प्रश्न है कि एकतरफा संवाद और सवाल-जवाब आधारित संवाद में अंतर होता है। "मन की बात" में जनता सवाल नहीं पूछ सकती। सोशल मीडिया पोस्ट में पत्रकार प्रतिप्रश्न नहीं कर सकते। इसलिए प्रेस कॉन्फ्रेंस का विकल्प पूरी तरह तैयार नहीं हुआ है।
क्या वास्तव में मोदी ने कभी प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं की?
तकनीकी दृष्टि से यह दावा विवादास्पद है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने कार्यकाल में स्वतंत्र रूप से पत्रकारों के प्रश्नों का सामना करने वाली पूर्ण प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं की है। हालांकि चुनावी अभियानों और विदेशी दौरों के दौरान संयुक्त प्रेस कार्यक्रमों में उनकी उपस्थिति रही है।
फिर भी व्यापक धारणा यही बनी कि प्रधानमंत्री ने खुली प्रश्नोत्तर शैली की प्रेस कॉन्फ्रेंस से दूरी बनाए रखी है। यही कारण है कि यह मुद्दा राजनीतिक और बौद्धिक बहस का विषय बना हुआ है।
मोदी सरकार के 12 वर्षों की प्रमुख उपलब्धियां
किसी भी सरकार का मूल्यांकन केवल एक पहलू से नहीं किया जा सकता। यदि प्रेस कॉन्फ्रेंस लोकतांत्रिक जवाबदेही का पैमाना है, तो नीतिगत उपलब्धियां और प्रशासनिक सुधार भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।
1. आधारभूत संरचना का अभूतपूर्व विस्तार
सड़क, रेल, एक्सप्रेस-वे, एयरपोर्ट, मेट्रो और बंदरगाहों के निर्माण में उल्लेखनीय वृद्धि हुई।
राष्ट्रीय राजमार्गों का तेजी से विस्तार हुआ। वंदे भारत ट्रेनों का संचालन शुरू हुआ। कई नए हवाई अड्डे बने और क्षेत्रीय संपर्क योजना को बढ़ावा मिला।
2. डिजिटल क्रांति
डिजिटल इंडिया अभियान ने शासन व्यवस्था को नई दिशा दी।
यूपीआई ने भुगतान प्रणाली में क्रांति ला दी। आज भारत विश्व की सबसे बड़ी डिजिटल भुगतान अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। सरकारी योजनाओं के लाभ सीधे लाभार्थियों तक पहुंचाने में डीबीटी व्यवस्था प्रभावी साबित हुई।
3. वित्तीय समावेशन
जनधन योजना के माध्यम से करोड़ों लोगों के बैंक खाते खुले।
पहले जो लोग औपचारिक बैंकिंग प्रणाली से बाहर थे, वे वित्तीय मुख्यधारा में शामिल हुए।
4. सामाजिक कल्याण योजनाएं
उज्ज्वला योजना, स्वच्छ भारत मिशन, प्रधानमंत्री आवास योजना, आयुष्मान भारत, हर घर जल, पीएम किसान सम्मान निधि जैसी योजनाओं का व्यापक प्रभाव देखने को मिला।
इन योजनाओं ने गरीब और निम्न मध्यम वर्ग के जीवन स्तर में सुधार का प्रयास किया।
5. विदेश नीति में सक्रियता
भारत की वैश्विक प्रतिष्ठा बढ़ी।
जी-20 की अध्यक्षता, अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की सक्रिय भूमिका और रणनीतिक साझेदारियों का विस्तार मोदी सरकार की महत्वपूर्ण उपलब्धियों में गिना जाता है।
6. राष्ट्रीय सुरक्षा
उरी और पुलवामा हमलों के बाद सर्जिकल स्ट्राइक तथा बालाकोट एयर स्ट्राइक को सरकार ने आतंकवाद के खिलाफ निर्णायक कार्रवाई के रूप में प्रस्तुत किया।
सीमा सुरक्षा और रक्षा आधुनिकीकरण पर भी विशेष बल दिया गया।
7. अनुच्छेद 370 और तीन तलाक
जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाना और तीन तलाक कानून लागू करना मोदी सरकार के वैचारिक एजेंडे की बड़ी उपलब्धियों के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।
मोदी सरकार की 12 वर्षों की प्रमुख आलोचनाएं और कमियां
जहां उपलब्धियां हैं, वहीं आलोचनाएं भी हैं। लोकतंत्र में संतुलित मूल्यांकन का अर्थ यही है कि उपलब्धियों के साथ कमियों पर भी ईमानदारी से चर्चा हो।
1. प्रेस से दूरी और जवाबदेही का प्रश्न
सबसे बड़ी आलोचना यही रही कि प्रधानमंत्री ने खुली प्रेस कॉन्फ्रेंसों से परहेज किया।
इससे यह धारणा बनी कि सरकार कठिन सवालों से बचती है।
2. बेरोजगारी की चुनौती
युवा रोजगार आज भी बड़ी चिंता का विषय है।
विकास दर बढ़ने के बावजूद गुणवत्तापूर्ण रोजगार सृजन अपेक्षित स्तर पर नहीं हो पाया।
3. कृषि संकट
किसानों की आय दोगुनी करने का लक्ष्य पूरी तरह हासिल नहीं हो सका।
कृषि कानूनों को वापस लेने की घटना ने सरकार और किसानों के बीच विश्वास संकट को उजागर किया।
4. सामाजिक ध्रुवीकरण
आलोचक आरोप लगाते हैं कि देश में राजनीतिक और सामाजिक ध्रुवीकरण बढ़ा है।
समर्थकों का तर्क है कि यह वैचारिक संघर्ष पहले से मौजूद था, जो अब अधिक दिखाई देने लगा है।
5. संस्थाओं की स्वायत्तता पर बहस
विपक्ष समय-समय पर जांच एजेंसियों और संवैधानिक संस्थाओं के दुरुपयोग के आरोप लगाता रहा है।
हालांकि सरकार इन आरोपों को निराधार बताती है।
6. महंगाई और आर्थिक असमानता
महंगाई और बढ़ती आर्थिक विषमता भी चिंता का विषय रही है।
अर्थव्यवस्था के विकास का लाभ समाज के सभी वर्गों तक समान रूप से पहुंचा या नहीं, इस पर बहस जारी है।
लोकतंत्र में आलोचना और प्रशंसा दोनों आवश्यक
किसी प्रधानमंत्री का मूल्यांकन केवल प्रेस कॉन्फ्रेंसों की संख्या से नहीं किया जा सकता। यदि ऐसा होता, तो इतिहास की जटिलताओं और शासन की बहुआयामी प्रकृति को नज़रअंदाज़ कर दिया जाता।
उसी प्रकार केवल विकास परियोजनाओं की सूची गिनाकर लोकतांत्रिक जवाबदेही के प्रश्नों को भी नहीं दबाया जा सकता।
एक मजबूत लोकतंत्र में सरकार की उपलब्धियों का सम्मान होना चाहिए, लेकिन साथ ही सरकार से सवाल पूछने का अधिकार भी सुरक्षित रहना चाहिए।
भारत को किस दिशा में बढ़ना चाहिए?
भारत विश्व की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक व्यवस्था है। यहां जनता केवल मतदाता नहीं, बल्कि अंतिम निर्णायक शक्ति है। इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि सरकारें विकास और जवाबदेही के बीच संतुलन स्थापित करें।
यदि प्रधानमंत्री नियमित प्रेस कॉन्फ्रेंस करें, कठिन प्रश्नों का उत्तर दें और मीडिया के साथ संस्थागत संवाद स्थापित करें, तो इससे लोकतंत्र और मजबूत होगा।
वहीं मीडिया की भी जिम्मेदारी है कि वह निष्पक्ष, तथ्यपरक और जनहित आधारित प्रश्न पूछे, न कि राजनीतिक एजेंडे का माध्यम बने।
निष्कर्ष
मोदी सरकार के 12 वर्ष भारतीय राजनीति के इतिहास में परिवर्तनकारी कालखंड के रूप में दर्ज किए जाएंगे। इस दौर में भारत ने डिजिटल परिवर्तन, आधारभूत संरचना, वैश्विक प्रतिष्ठा और कल्याणकारी योजनाओं के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है। वहीं प्रेस स्वतंत्रता, जवाबदेही, बेरोजगारी, सामाजिक ध्रुवीकरण और संस्थागत संतुलन जैसे प्रश्न भी उतनी ही गंभीरता से हमारे सामने खड़े हैं।
लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति सत्ता के गुणगान में नहीं, बल्कि सत्ता से प्रश्न पूछने की स्वतंत्रता में निहित होती है। एक आदर्श लोकतंत्र वह है जहां सरकार उपलब्धियों पर गर्व करे, विपक्ष रचनात्मक आलोचना करे, मीडिया निर्भीक होकर सवाल पूछे और जनता तथ्यों के आधार पर अपना निर्णय दे।
आखिरकार, लोकतंत्र में अंतिम प्रेस कॉन्फ्रेंस हर पांच वर्ष में जनता करती है—जिसका उत्तर मतपेटी के माध्यम से दिया जाता है। वही उत्तर किसी भी सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि या सबसे बड़ी विफलता का अंतिम प्रमाण बनता है।
Reviewed by PSA Live News
on
11:46:00 pm
Rating:

कोई टिप्पणी नहीं: