— डॉ. अनुराग सक्सेना के विचारों के आलोक में एक चिंतन
लोकतंत्र की सफलता केवल संविधान, संसद, न्यायपालिका और कार्यपालिका की मजबूती पर निर्भर नहीं करती, बल्कि उस शक्ति पर भी आधारित होती है जो सत्ता और जनता के बीच संवाद का सेतु बनती है। यही कारण है कि पत्रकारिता को लंबे समय से "राष्ट्र का चौथा स्तंभ" कहा जाता रहा है। यह केवल एक उपाधि नहीं, बल्कि एक अत्यंत महत्वपूर्ण दायित्व का प्रतीक है।
जब "चौथा स्तंभ" शब्द सुनाई देता है, तो मन में ऐसी पत्रकारिता की छवि उभरती है जो निष्पक्ष हो, निर्भीक हो, सत्य के प्रति प्रतिबद्ध हो और जनहित को सर्वोपरि मानती हो। ऐसी पत्रकारिता जो सत्ता से प्रश्न पूछने का साहस रखती हो, समाज की पीड़ा को मुखर स्वर देती हो और लोकतंत्र को जीवंत बनाए रखने में अपनी प्रभावी भूमिका निभाती हो।
इसी संदर्भ में जर्नलिस्ट काउंसिल ऑफ इंडिया (रजि.) के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. अनुराग सक्सेना ने एक गोष्ठी के दौरान अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि पत्रकारिता का मूल उद्देश्य समाज को सही दिशा देना, जनभावनाओं को अभिव्यक्ति प्रदान करना और सत्ता को उसके दायित्वों का बोध कराना है। किंतु वर्तमान परिस्थितियों में पत्रकारिता के समक्ष अनेक गंभीर चुनौतियाँ खड़ी हो गई हैं, जिन पर गंभीर चिंतन की आवश्यकता है।
आज जब हम पत्रकारिता की वास्तविक स्थिति का मूल्यांकन करते हैं, तो एक चिंताजनक तस्वीर सामने आती है। ऐसा प्रतीत होता है कि मीडिया जगत का एक बड़ा हिस्सा अपने मूल दायित्वों से भटकता जा रहा है। यदि सामान्य आकलन किया जाए, तो शायद केवल 20 से 25 प्रतिशत पत्रकारिता ही अपने वास्तविक स्वरूप में जनहित और सत्य के प्रति समर्पित दिखाई देती है, जबकि शेष विभिन्न प्रकार के दबावों, सीमाओं और समझौतों के बीच कार्य कर रही है।
यह स्थिति कई प्रश्न खड़े करती है। आखिर वह कौन-सा भय है जो लोकतंत्र के इस महत्वपूर्ण स्तंभ को भीतर से कमजोर कर रहा है? क्या यह राजनीतिक दबाव का परिणाम है? क्या आर्थिक निर्भरता ने संपादकीय स्वतंत्रता को प्रभावित किया है? क्या विज्ञापन आधारित व्यवस्था ने समाचारों की प्राथमिकताओं को बदल दिया है? या फिर बढ़ते मुकदमों, धमकियों, ट्रोल संस्कृति और सामाजिक दबावों ने पत्रकारों के आत्मविश्वास को चोट पहुँचाई है?
संभवतः इन सभी कारणों का सम्मिलित प्रभाव आज की पत्रकारिता पर दिखाई देता है।
वर्तमान समय का पत्रकार अनेक मोर्चों पर संघर्ष कर रहा है। एक ओर उसके कंधों पर सत्य को सामने लाने का दायित्व है, वहीं दूसरी ओर उसे संस्थागत दबाव, नौकरी की असुरक्षा, सीमित संसाधन, आर्थिक चुनौतियाँ और व्यक्तिगत जोखिमों का सामना भी करना पड़ता है। कई पत्रकार ऐसे वातावरण में काम कर रहे हैं, जहाँ एक समाचार उनके करियर, प्रतिष्ठा अथवा सुरक्षा के लिए संकट का कारण बन सकता है।
इन परिस्थितियों में कुछ लोग समझौते का रास्ता चुन लेते हैं। वे व्यवस्था के अनुकूल चलने को ही व्यावहारिकता मान लेते हैं। लेकिन इसके विपरीत ऐसे पत्रकार भी हैं जो तमाम कठिनाइयों के बावजूद सच की मशाल जलाए हुए हैं। वे जानते हैं कि पत्रकारिता केवल पेशा नहीं, बल्कि सामाजिक उत्तरदायित्व है; केवल रोजगार नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा का माध्यम है।
यह भी समझना होगा कि पत्रकारिता का संकट केवल पत्रकारों का संकट नहीं है, बल्कि यह पूरे लोकतंत्र का संकट है। जब समाचार निष्पक्ष नहीं होंगे, जब जनहित के मुद्दों की जगह सनसनी और प्रायोजित विमर्श ले लेंगे, जब तथ्य और भ्रम के बीच की रेखा धुंधली पड़ जाएगी, तब समाज की निर्णय लेने की क्षमता प्रभावित होगी। नागरिकों तक यदि आधा-अधूरा या पक्षपातपूर्ण सत्य पहुँचेगा, तो लोकतंत्र का आधार कमजोर होना स्वाभाविक है।
आज सूचना क्रांति का युग है। डिजिटल मीडिया और सोशल मीडिया ने सूचनाओं के प्रवाह को अत्यंत तेज बना दिया है। हर व्यक्ति एक प्रकार से सूचना का प्रसारक बन चुका है। ऐसे समय में पत्रकारिता की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है। केवल सबसे पहले समाचार देना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि तथ्यपरक, संतुलित और प्रमाणित जानकारी देना पत्रकारिता की सबसे बड़ी कसौटी होनी चाहिए।
दुर्भाग्यवश, "टीआरपी की दौड़", "क्लिक आधारित पत्रकारिता" और "वायरल होने की मानसिकता" ने कई बार समाचारों की गंभीरता को प्रभावित किया है। बहसों का स्तर गिरा है, तथ्यों की जगह आरोप-प्रत्यारोप ने ले ली है और जनसरोकार के अनेक महत्वपूर्ण विषय हाशिए पर चले गए हैं। किसान, मजदूर, शिक्षा, स्वास्थ्य, ग्रामीण विकास, बेरोजगारी और स्थानीय समस्याएँ उतनी प्रमुखता नहीं पा रहीं, जितनी उन्हें मिलनी चाहिए।
ऐसी परिस्थितियों में आवश्यक है कि पत्रकारिता अपने मूल मूल्यों की ओर पुनः लौटे। सत्य, निष्पक्षता, साहस, संवेदनशीलता और जनहित—ये केवल आदर्श वाक्य नहीं, बल्कि पत्रकारिता की आत्मा हैं। यदि यह आत्मा जीवित रहेगी, तभी लोकतंत्र स्वस्थ और मजबूत रहेगा।
इसके साथ ही पत्रकारों को सुरक्षित और स्वतंत्र कार्य वातावरण उपलब्ध कराना भी समय की आवश्यकता है। उनकी सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा सुनिश्चित की जानी चाहिए। मीडिया संस्थानों को संपादकीय स्वतंत्रता का सम्मान करना होगा और समाज को भी सत्य बोलने वालों के साथ खड़ा होना होगा। क्योंकि जो पत्रकार जनता के अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष करता है, उसकी सुरक्षा और गरिमा की रक्षा करना भी समाज का दायित्व है।
राष्ट्र का चौथा स्तंभ तभी मजबूत रह सकता है, जब उसकी नींव सत्य, स्वतंत्रता और नैतिकता पर टिकी हो। यदि यह स्तंभ कमजोर होगा, तो लोकतंत्र की पूरी इमारत प्रभावित होगी। इसलिए समय की मांग है कि पत्रकारिता को खोखला करने वाली शक्तियों की पहचान की जाए, उनसे संघर्ष किया जाए और इस महान संस्था को पुनः उसकी गरिमा एवं सम्मान के साथ स्थापित किया जाए।
अंततः यह स्मरण रखना होगा कि पत्रकारिता का उद्देश्य किसी सत्ता का विरोध करना नहीं, बल्कि सत्य का समर्थन करना है; किसी व्यक्ति विशेष का पक्ष लेना नहीं, बल्कि जनहित की रक्षा करना है। जिस दिन पत्रकारिता पुनः इसी मूल भावना के साथ खड़ी होगी, उसी दिन "राष्ट्र का चौथा स्तंभ" केवल एक उपमा नहीं रहेगा, बल्कि अपने नाम के अनुरूप राष्ट्र और समाज का सशक्त प्रहरी बनकर उभरेगा।
– लेखकीय प्रस्तुति
डॉ. अनुराग सक्सेना के विचारों पर आधारित
"सत्य की रक्षा ही पत्रकारिता का सर्वोच्च धर्म है।"
Reviewed by PSA Live News
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1:01:00 pm
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