लेखक : अशोक कुमार झा
संपादक – रांची दस्तक एवं PSA Live News
वरिष्ठ पत्रकार, सामाजिक एवं राष्ट्रीय विषयों के विश्लेषक
सोशल मीडिया पर वायरल हो रही इस तस्वीर में लिखा गया है— “गरीब मांगे तो भीख, अमीर मांगे तो चंदा, संत मांगे तो दान, करोड़पति मांगे तो डोनेशन, नेता मांगे तो टैक्स, वर मांगे तो दहेज— ये सब भीख के पर्यायवाची हैं।” पहली नजर में यह एक व्यंग्यात्मक पोस्टर लगता है, लेकिन इसके पीछे छिपा संदेश भारतीय समाज की कई गहरी सच्चाइयों को उजागर करता है। यह तस्वीर केवल शब्दों का खेल नहीं है, बल्कि समाज में मौजूद आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक विसंगतियों पर तीखा कटाक्ष भी है।
सबसे पहले यदि गरीब व्यक्ति की बात करें तो समाज में जब कोई निर्धन व्यक्ति अपनी भूख मिटाने या जीवनयापन के लिए हाथ फैलाता है, तो उसे “भिखारी” कहा जाता है। उसके मांगने को हीन दृष्टि से देखा जाता है। लोग उसे दया का पात्र मानते हैं, लेकिन सम्मान नहीं देते। जबकि दूसरी ओर यदि कोई बड़ी संस्था, उद्योगपति या संपन्न व्यक्ति किसी परियोजना, आयोजन या सामाजिक कार्य के लिए धन एकत्र करता है, तो उसे “चंदा” या “फंड रेजिंग” कहा जाता है। शब्द बदल जाता है और उसके साथ समाज का नजरिया भी बदल जाता है। यही तस्वीर इस दोहरे मापदंड को उजागर करती है।
धार्मिक क्षेत्र में भी यही स्थिति दिखाई देती है। मंदिरों, आश्रमों और धार्मिक संस्थाओं में धन संग्रह को “दान” कहा जाता है। भारतीय संस्कृति में दान को पुण्य कार्य माना गया है और वास्तव में समाज सेवा के लिए दिया गया दान सम्माननीय भी है। लेकिन जब कुछ लोग धर्म और आस्था का उपयोग केवल धन जुटाने के साधन के रूप में करते हैं, तब यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि मांगने का स्वरूप बदल जाने से उसका उद्देश्य भी बदल जाता है या नहीं। तस्वीर इसी प्रश्न को व्यंग्य के माध्यम से सामने रखती है।
आधुनिक दौर में “डोनेशन” शब्द का प्रयोग विशेष रूप से शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक संस्थाओं में सुनाई देता है। कई निजी विद्यालयों, कॉलेजों और संस्थानों में प्रवेश के नाम पर भारी-भरकम डोनेशन लिए जाने के आरोप लगते रहे हैं। जब एक सामान्य नागरिक अपनी मेहनत की कमाई का बड़ा हिस्सा किसी संस्था को देता है, तो वह इसे मजबूरी मानता है, जबकि संस्थान इसे वैध शुल्क या सहयोग का नाम देते हैं। ऐसे में यह तस्वीर संकेत करती है कि शब्दों का आवरण वास्तविकता को हमेशा नहीं बदल सकता।
राजनीतिक व्यवस्था पर भी यह पोस्टर तीखा प्रहार करता है। इसमें कहा गया है कि “नेता मांगे तो टैक्स।” निश्चित रूप से लोकतांत्रिक व्यवस्था में टैक्स किसी भी राष्ट्र की अर्थव्यवस्था का आधार होता है और सरकार के संचालन, विकास कार्यों तथा जनकल्याणकारी योजनाओं के लिए आवश्यक है। लेकिन आम जनता के मन में अक्सर यह सवाल उठता है कि यदि करों के बदले उन्हें गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, रोजगार और सुरक्षा नहीं मिलती, तो फिर टैक्स का बोझ क्यों बढ़ता जा रहा है। यही जनभावना इस व्यंग्यात्मक टिप्पणी में परिलक्षित होती है। यह टैक्स व्यवस्था का विरोध नहीं, बल्कि जवाबदेही की मांग है।
तस्वीर का सबसे संवेदनशील पहलू दहेज प्रथा पर टिप्पणी है। इसमें लिखा गया है— “वर मांगे तो दहेज।” भारतीय समाज में दहेज एक ऐसी सामाजिक बुराई है जिसने हजारों परिवारों को आर्थिक और मानसिक रूप से तोड़ा है। विवाह जैसे पवित्र बंधन को जब लेन-देन का सौदा बना दिया जाता है, तब रिश्तों की गरिमा समाप्त होने लगती है। दहेज मांगने वाला व्यक्ति अक्सर सामाजिक प्रतिष्ठा का दावा करता है, लेकिन वस्तुतः वह भी किसी न किसी रूप में आर्थिक लाभ की मांग ही कर रहा होता है। इसीलिए तस्वीर दहेज को भीख का एक रूप बताकर समाज को आईना दिखाने का प्रयास करती है।
यह पोस्टर हमें भाषा और वास्तविकता के संबंध पर भी सोचने के लिए मजबूर करता है। समाज में कई बार एक ही कार्य को अलग-अलग नाम देकर उसकी नैतिकता बदलने की कोशिश की जाती है। गरीब की मांग को भीख, धार्मिक संस्था की मांग को दान, राजनीतिक व्यवस्था की मांग को टैक्स और सामाजिक प्रतिष्ठा से जुड़ी मांग को दहेज कहा जाता है। लेकिन सवाल यह है कि किसी मांग का मूल्यांकन उसके नाम से होगा या उसके उद्देश्य और नैतिकता से?
हालांकि इस तस्वीर को पूरी तरह शाब्दिक सत्य नहीं माना जा सकता। दान, चंदा और टैक्स जैसी व्यवस्थाओं का अपना वैध और सामाजिक महत्व भी है। दान से जरूरतमंदों की सहायता होती है, चंदे से सामाजिक और सांस्कृतिक कार्यक्रम चलते हैं तथा टैक्स से राष्ट्र का विकास संभव होता है। इसलिए इन सभी को सीधे-सीधे भीख कहना उचित नहीं होगा। लेकिन व्यंग्य का उद्देश्य तथ्यात्मक परिभाषा देना नहीं, बल्कि समाज को सोचने पर मजबूर करना होता है। यही कारण है कि यह तस्वीर लोगों के बीच चर्चा का विषय बन रही है।
अंततः यह तस्वीर समाज में मौजूद असमानताओं, दोहरे मानदंडों और नैतिक प्रश्नों पर एक सशक्त व्यंग्य प्रस्तुत करती है। यह हमें याद दिलाती है कि किसी भी मांग की गरिमा या अपमान केवल उसके नाम से तय नहीं होता, बल्कि उसके पीछे छिपे उद्देश्य, आवश्यकता और नैतिक आधार से तय होता है। जब तक समाज में आर्थिक विषमता, दहेज जैसी कुरीतियां, पारदर्शिता की कमी और अवसरों की असमानता बनी रहेगी, तब तक ऐसे व्यंग्य लोगों को सोचने और व्यवस्था पर प्रश्न उठाने के लिए प्रेरित करते रहेंगे।
Reviewed by PSA Live News
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7:51:00 pm
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