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जीरो की राजनीति और लोकतंत्र का गणित: गौरव वल्लभ प्रकरण से उठते बड़े सवाल


- अशोक कुमार झा

राजनीति केवल विचारों का संघर्ष नहीं होती, यह अवसर, प्रतीक्षा, महत्वाकांक्षा, धैर्य, निष्ठा और समय के निर्मम गणित का भी खेल है। यहां कभी एक वाक्य किसी नेता को राष्ट्रीय पहचान दिला देता है तो कभी वही वाक्य वर्षों बाद उसके राजनीतिक जीवन पर व्यंग्य का माध्यम बन जाता है। झारखंड की राज्यसभा राजनीति के बीच एक बार फिर ऐसा ही हुआ है। कभी टेलीविजन की बहसों में गूंजने वाला सवाल—"एक ट्रिलियन में कितने जीरो होते हैं?"—फिर से चर्चा में है। फर्क सिर्फ इतना है कि तब यह सवाल भाजपा के प्रवक्ता संबित पात्रा से पूछा गया था और आज उसी सवाल के जरिए भाजपा में शामिल हो चुके गौरव वल्लभ पर राजनीतिक कटाक्ष किए जा रहे हैं।

यह घटना केवल किसी एक नेता के राजनीतिक उतार-चढ़ाव की कहानी नहीं है, बल्कि यह आधुनिक भारतीय राजनीति के बदलते चरित्र, राजनीतिक दलों के भीतर अवसरवाद, विचारधारा के क्षरण, टिकट वितरण की अपारदर्शिता और सोशल मीडिया आधारित राजनीतिक विमर्श की भी कहानी है।

वह एक सवाल जिसने राष्ट्रीय पहचान दिलाई

वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान एक टीवी बहस में कांग्रेस प्रवक्ता के रूप में गौरव वल्लभ ने भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा से पूछा था कि आखिर एक ट्रिलियन में कितने जीरो होते हैं। आर्थिक मुद्दे पर पूछे गए इस सवाल ने अचानक पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींच लिया। सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल हो गया। समर्थकों ने इसे भाजपा की आर्थिक समझ पर सवाल उठाने वाला क्षण बताया तो विरोधियों ने इसे एक राजनीतिक नाटकीयता कहा।

लेकिन इस घटना ने गौरव वल्लभ को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिला दी। एक अर्थशास्त्री, प्रबंधन विशेषज्ञ और तेज-तर्रार प्रवक्ता के रूप में उनकी छवि स्थापित हो गई। राजनीति में पहचान का यह दौर उनके लिए संभावनाओं के नए द्वार खोलता दिखाई दिया।

राजनीति में स्थायी मित्र और शत्रु नहीं होते

समय बीतता गया और भारतीय राजनीति का सबसे पुराना सिद्धांत एक बार फिर सही साबित हुआ कि राजनीति में न कोई स्थायी मित्र होता है और न कोई स्थायी शत्रु। जिस भाजपा की आर्थिक नीतियों और नेतृत्व पर गौरव वल्लभ कभी तीखे हमले करते थे, उसी भाजपा में उन्होंने प्रवेश कर लिया।

उन्होंने कांग्रेस छोड़ते समय पार्टी नेतृत्व की कार्यशैली पर सवाल उठाए और कहा कि कांग्रेस दिशाहीन हो चुकी है। दूसरी ओर भाजपा ने उन्हें खुले दिल से स्वीकार किया। यह भारतीय राजनीति की नई वास्तविकता है, जहां विचारधारा की सीमाएं पहले की तुलना में कहीं अधिक लचीली हो चुकी हैं।

एक समय था जब दल बदलना राजनीतिक नैतिकता पर प्रश्नचिह्न माना जाता था। आज इसे राजनीतिक रणनीति, व्यक्तिगत संभावनाओं और संगठनात्मक अवसरों के चश्मे से देखा जाने लगा है।

राज्यसभा: प्रतिनिधित्व या राजनीतिक पुरस्कार?

झारखंड में राज्यसभा चुनाव की प्रक्रिया शुरू हुई तो चर्चा होने लगी कि भाजपा गौरव वल्लभ को राज्यसभा भेज सकती है। बताया गया कि उन्होंने नामांकन पत्र तक खरीद लिया था और अंतिम क्षण तक पार्टी के निर्णय की प्रतीक्षा करते रहे।

यहीं से एक बड़ा प्रश्न खड़ा होता है—क्या राज्यसभा वास्तव में राज्यों के प्रतिनिधित्व का सदन रह गई है या यह राजनीतिक प्रबंधन का मंच बनती जा रही है?

संविधान निर्माताओं ने राज्यसभा की परिकल्पना एक ऐसे सदन के रूप में की थी जहां अनुभवी, विद्वान और विविध क्षेत्रों के विशेषज्ञ देश के नीति निर्माण में योगदान दें। लेकिन समय के साथ यह आरोप लगते रहे हैं कि राज्यसभा की सीटें कई बार राजनीतिक समीकरणों, आर्थिक प्रभाव, संगठनात्मक निष्ठा अथवा रणनीतिक हितों के आधार पर तय होती हैं।

यह आरोप केवल किसी एक दल पर नहीं है। कांग्रेस हो, भाजपा हो या क्षेत्रीय दल—लगभग सभी दलों पर समय-समय पर ऐसे आरोप लगते रहे हैं।

जेएमएम का तंज और सोशल मीडिया की राजनीति

झारखंड मुक्ति मोर्चा द्वारा किया गया यह कटाक्ष कि "भाजपा इनसे ZERO गिनवाती रही और बड़े सूटकेस वाले गुजराती को राज्यसभा सीट बेच दिया" केवल एक राजनीतिक टिप्पणी नहीं है। यह आज की उस राजनीति का प्रतीक है जिसमें सोशल मीडिया एक वैचारिक मंच से अधिक व्यंग्य, कटाक्ष और त्वरित राजनीतिक हमलों का माध्यम बन चुका है।

आज राजनीतिक दल लंबी वैचारिक बहसों से अधिक छोटे, तीखे और वायरल होने वाले संदेशों को प्राथमिकता देते हैं। किसी नेता के वर्षों पुराने वीडियो को निकालकर वर्तमान संदर्भ में प्रस्तुत करना अब सामान्य राजनीतिक रणनीति बन चुकी है।

इसका सकारात्मक पक्ष यह है कि जनता राजनीतिक स्मृति बनाए रखती है। लेकिन इसका नकारात्मक पक्ष यह है कि गंभीर नीतिगत बहसें अक्सर व्यक्तिगत कटाक्ष और ट्रोल संस्कृति में बदल जाती हैं।

गौरव वल्लभ की राजनीतिक यात्रा: संघर्ष और असफलताएं

गौरव वल्लभ की राजनीतिक यात्रा भी कम दिलचस्प नहीं रही है। राजस्थान के जोधपुर में जन्मे गौरव वल्लभ जमशेदपुर स्थित प्रतिष्ठित संस्थान एक्सएलआरआई में प्रोफेसर रहे। शिक्षा जगत से राजनीति में आए और राष्ट्रीय प्रवक्ता बने।

वर्ष 2019 में कांग्रेस ने उन्हें झारखंड की जमशेदपुर पूर्वी विधानसभा सीट से उम्मीदवार बनाया। उनके सामने तत्कालीन मुख्यमंत्री रघुवर दास थे। यह चुनाव राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बना। लेकिन परिणाम अप्रत्याशित रहा। निर्दलीय उम्मीदवार सरयू राय ने दोनों दिग्गजों को पराजित कर राजनीतिक इतिहास रच दिया।

इसके बाद राजस्थान विधानसभा चुनाव में भी उन्हें उदयपुर से टिकट मिला, लेकिन वहां भी सफलता हाथ नहीं लगी।

लगातार चुनावी हार के बावजूद वे राष्ट्रीय राजनीति में प्रासंगिक बने रहे। इसका कारण उनका बौद्धिक पक्ष, आर्थिक विषयों पर पकड़ और मीडिया में प्रभावी उपस्थिति रही।

क्या राजनीति में योग्यता पर्याप्त है?

गौरव वल्लभ प्रकरण एक और महत्वपूर्ण प्रश्न उठाता है—क्या राजनीति में केवल योग्यता पर्याप्त है?

भारतीय लोकतंत्र में कई ऐसे उदाहरण हैं जहां अत्यंत विद्वान, प्रशासनिक अनुभव रखने वाले और बौद्धिक रूप से सक्षम लोग चुनावी राजनीति में सफल नहीं हो पाए। वहीं कई ऐसे नेता भी हैं जिन्होंने सीमित शैक्षणिक पृष्ठभूमि के बावजूद जनता से गहरे जुड़ाव के आधार पर असाधारण सफलता प्राप्त की।

राजनीति केवल ज्ञान का मंच नहीं है। यह जनसंपर्क, संगठनात्मक स्वीकार्यता, राजनीतिक धैर्य, सामाजिक समीकरण और समय की समझ का सम्मिलित परिणाम है।

गौरव वल्लभ की यात्रा इस सत्य को भी रेखांकित करती है।

दल बदल की संस्कृति और वैचारिक संकट

आज भारतीय राजनीति का सबसे बड़ा संकट विचारधारात्मक प्रतिबद्धता का कमजोर होना भी है। नेता दल बदलते हैं, पुराने भाषण उनके खिलाफ इस्तेमाल होते हैं और जनता के सामने यह प्रश्न खड़ा होता है कि आखिर स्थायी मूल्य क्या हैं।

यदि कल तक कोई नेता किसी दल को देश के लिए खतरनाक बता रहा था और आज उसी दल को राष्ट्रनिर्माण का सबसे बड़ा माध्यम बता रहा है, तो जनता स्वाभाविक रूप से प्रश्न करेगी कि परिवर्तन विचारों का हुआ है या परिस्थितियों का।

यह प्रश्न केवल गौरव वल्लभ तक सीमित नहीं है। यह लगभग हर राजनीतिक दल के लिए समान रूप से प्रासंगिक है।

लोकतंत्र का वास्तविक गणित

दरअसल, लोकतंत्र का वास्तविक गणित ट्रिलियन में मौजूद जीरो की संख्या से कहीं अधिक जटिल है। यहां जीरो कभी किसी नेता की पहचान बन जाता है तो कभी व्यंग्य का प्रतीक। यहां राजनीतिक संभावनाएं अंतिम क्षण तक बदलती रहती हैं। यहां टिकट मिलना योग्यता की गारंटी नहीं और टिकट कट जाना राजनीतिक समाप्ति का प्रमाण नहीं होता।

लोकतंत्र में अंतिम निर्णय जनता की स्मृति, राजनीतिक दलों की रणनीति और समय के बदलते समीकरणों से तय होता है।

निष्कर्ष

गौरव वल्लभ का प्रकरण भारतीय राजनीति के अनेक आयामों को एक साथ उजागर करता है—विचारधारा की बदलती परिभाषा, राज्यसभा की राजनीति, सोशल मीडिया का प्रभाव, दल बदल की संस्कृति, राजनीतिक महत्वाकांक्षा और लोकतंत्र का कठोर यथार्थ।

कभी उन्होंने पूछा था—"एक ट्रिलियन में कितने जीरो होते हैं?"

आज राजनीति उनसे मानो एक दूसरा सवाल पूछ रही है—क्या लोकतंत्र का गणित केवल अंकों से तय होता है या फिर उसमें निष्ठा, प्रतीक्षा, स्वीकार्यता और जनता के विश्वास का भी उतना ही महत्व होता है?

संभव है, इस प्रश्न का उत्तर किसी अर्थशास्त्र की पुस्तक में न मिले। लेकिन भारतीय राजनीति का इतिहास इसे हर चुनाव, हर नियुक्ति और हर अधूरी राजनीतिक आकांक्षा के माध्यम से बार-बार लिखता रहता है।

लेखक परिचय :

अशोक कुमार झा पिछले कई वर्षों से पत्रकारिता और जनसंचार के क्षेत्र में सक्रिय हैं। आप 'रांची दस्तक' एवं 'PSA Live News' के संपादक के रूप में कार्यरत हैं। झारखंड की राजनीति, राष्ट्रीय सुरक्षा, सामाजिक परिवर्तन, प्रशासनिक व्यवस्था, ग्रामीण विकास, सांस्कृतिक विरासत और जनहित से जुड़े मुद्दों पर आपकी विशेष पकड़ मानी जाती है। आपके विश्लेषणात्मक संपादकीय लेख अपनी तथ्यपरकता, गहन अध्ययन और जनसरोकारों के कारण पाठकों के बीच विशेष पहचान रखते हैं। आप जनहित के मुद्दों को प्रमुखता से उठाने और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्ध पत्रकारिता के पक्षधर हैं।

जीरो की राजनीति और लोकतंत्र का गणित: गौरव वल्लभ प्रकरण से उठते बड़े सवाल जीरो की राजनीति और लोकतंत्र का गणित: गौरव वल्लभ प्रकरण से उठते बड़े सवाल Reviewed by PSA Live News on 9:56:00 pm Rating: 5

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