टेंशन नहीं लेने का ग्रेट सर्कस जारी है : कुर्सियों के खेल में कहीं जनता का जनादेश तो नहीं हो रहा नीलाम?
विचारधारा की मौत, अवसरवाद का उत्सव और लोकतंत्र के नाम पर चलता राजनीतिक तमाशा
प्रधान संपादक – रांची दस्तक एवं PSA Live News
वरिष्ठ पत्रकार, राजनीतिक विश्लेषक एवं सामाजिक सरोकारों से जुड़े स्वतंत्र टिप्पणीकार
"कुर्सी की पेटी बांध लीजिए... झटका आने वाला है।" यह महज सोशल मीडिया पर वायरल हो रही एक पंक्ति नहीं है, बल्कि आज के राजनीतिक परिदृश्य का सबसे सटीक और तीखा व्यंग्य है। जिस लोकतंत्र को जनता ने अपने खून-पसीने की कमाई से कर चुकाकर, उम्मीदों का बोझ उठाकर और वोट की ताकत से मजबूत किया, उसी लोकतंत्र के मंच पर आज ऐसे दृश्य दिखाई देने लगे हैं जिन्हें देखकर आम नागरिक के मुंह से अनायास निकल पड़ता है—क्या सचमुच राजनीति अब विचारधारा की नहीं, बल्कि अवसरवाद की सबसे बड़ी प्रयोगशाला बन चुकी है?
चुनाव के दौरान जनता से बड़े-बड़े वादे किए जाते हैं। कोई खुद को संविधान का सबसे बड़ा रक्षक बताता है, कोई राष्ट्रवाद का सबसे बड़ा प्रहरी होने का दावा करता है, कोई लोकतंत्र बचाने की दुहाई देता है, तो कोई भ्रष्टाचार मिटाने का संकल्प लेता है। लेकिन जैसे ही चुनावी नतीजे सामने आते हैं, राजनीतिक नैतिकता की किताब बंद कर दी जाती है और सत्ता की नई पटकथा लिखी जाने लगती है। कल तक जो नेता एक-दूसरे को लोकतंत्र का हत्यारा बता रहे थे, आज वही सत्ता के गलियारों में मुस्कुराते हुए हाथ मिलाते दिखाई देते हैं। जनता हैरान होकर पूछती है कि आखिर चुनाव विचारधारा के नाम पर लड़ा गया था या सत्ता की साझेदारी तय करने के लिए?
इसी बीच पश्चिम बंगाल की राजनीति को लेकर जो चर्चाएं सामने आ रही हैं, उन्होंने राजनीतिक हलकों में हलचल पैदा कर दी है। कहा जा रहा है कि तृणमूल कांग्रेस के बागी विधायक विपक्षी खेमे में बैठकर सरकार का विरोध कर सकते हैं और मुख्य विपक्षी दल का दर्जा प्राप्त करने की स्थिति बन सकती है। यदि ऐसा होता है तो यह केवल सत्ता परिवर्तन का संकेत नहीं होगा, बल्कि उस जनादेश की नई व्याख्या होगी जो जनता ने मतदान के दौरान दिया था। जिन नेताओं को जनता ने एक झंडे, एक नेतृत्व और एक विचार के नाम पर चुना, यदि वही नेता कुछ समय बाद नई राजनीतिक भूमिका में दिखाई दें, तो लोकतंत्र की आत्मा पर सवाल उठना स्वाभाविक है। आखिर मतदाता यह पूछने का अधिकार क्यों न रखे कि उसका वोट किसके पक्ष में इस्तेमाल हुआ और किस उद्देश्य के लिए?
राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी जोर पकड़ रही है कि बेहद सीमित जनाधार वाले एक छोटे दल में बड़े राजनीतिक चेहरों का विलय संभव है और संसद के भीतर उसका कद अचानक बढ़ सकता है। यदि यह समीकरण वास्तविकता में बदलता है, तो यह लोकतंत्र के उस विरोधाभास को उजागर करेगा, जहां जनता लाखों वोट देकर प्रतिनिधि चुनती है, लेकिन सत्ता के गलियारों में गणित इस प्रकार बदलता है कि मतदाता स्वयं को ठगा हुआ महसूस करने लगता है। यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि लोकतंत्र केवल कानूनी प्रक्रिया नहीं, बल्कि जनता और प्रतिनिधि के बीच विश्वास का अनुबंध भी होता है।
सबसे दिलचस्प और चिंताजनक स्थिति तब पैदा होती है जब एक ही राजनीतिक दल किसी राज्य में भाजपा को लोकतंत्र के लिए खतरा बताकर उसके खिलाफ संघर्ष करता दिखाई दे और केंद्र की राजनीति में उसी सत्ता व्यवस्था का समर्थन करता नजर आए। राजनीति में व्यावहारिकता आवश्यक है, लेकिन यदि सिद्धांत पूरी तरह गायब हो जाएं, तो राजनीति अवसरवाद का पर्याय बन जाती है। तब जनता यह समझ नहीं पाती कि चुनावी भाषणों पर भरोसा करे या सत्ता के बाद बनने वाले गठबंधनों पर।
दरअसल, हिंदुस्तान की राजनीति का सबसे बड़ा संकट विपक्ष या सत्ता नहीं है, बल्कि विश्वसनीयता का संकट है। जनता आज नेताओं के शब्दों पर नहीं, बल्कि उनके बदलते व्यवहार पर नजर रख रही है। वह देख रही है कि दल-बदल विरोधी कानून होने के बावजूद राजनीतिक दल किस प्रकार उसके जनादेश की नई व्याख्याएं खोज लेते हैं। वह यह भी देख रही है कि सत्ता की भूख किस तरह विचारधारा को पीछे छोड़ देती है। यही कारण है कि राजनीतिक व्यवस्था के प्रति अविश्वास बढ़ता जा रहा है।
लोकतंत्र में गठबंधन बनाना अपराध नहीं है। राजनीतिक रणनीति भी लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है। लेकिन समस्या तब शुरू होती है जब जनता से कुछ और कहा जाए और सत्ता के लिए कुछ और किया जाए। चुनाव पूर्व दुश्मनी और चुनाव बाद दोस्ती यदि केवल कुर्सी बचाने या कुर्सी पाने तक सीमित हो जाए, तो लोकतंत्र की नैतिकता कमजोर पड़ने लगती है। जनता को यह महसूस होने लगता है कि उसके वोट का इस्तेमाल उसकी इच्छा के अनुरूप नहीं, बल्कि सत्ता के समीकरणों के अनुसार किया गया।
आज आवश्यकता इस बात की है कि राजनीतिक दल आत्ममंथन करें। उन्हें यह समझना होगा कि लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत जनता का विश्वास है। चुनाव जीतना महत्वपूर्ण है, लेकिन जनता का भरोसा जीतना उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है। क्योंकि कुर्सियां पांच वर्षों के लिए मिलती हैं, लेकिन जनता का विश्वास पीढ़ियों तक साथ चलता है। यदि यह विश्वास टूट गया, तो लोकतंत्र का ढांचा भले खड़ा रहे, उसकी आत्मा कमजोर पड़ जाएगी।
यह समय नागरिकों के लिए भी आत्मचिंतन का है। हमें केवल तालियां बजाने वाले समर्थक नहीं, बल्कि सवाल पूछने वाले जागरूक मतदाता बनना होगा। हमें यह पूछना होगा कि जिन वादों के आधार पर वोट मांगे गए थे, उनका क्या हुआ? हमें यह भी जानने का अधिकार है कि राजनीतिक दलों की विचारधारा आखिर सत्ता के दरवाजे तक पहुंचते-पहुंचते क्यों बदल जाती है। लोकतंत्र में जनता केवल वोट देने वाली मशीन नहीं होती; वही उसकी असली मालिक होती है।
आज जब चारों ओर राजनीतिक समीकरणों की चर्चा है, तब यही कहना उचित होगा कि "कुर्सी की पेटी बांध लीजिए, झटका सचमुच आने वाला है", लेकिन यह झटका केवल सरकारों को नहीं, बल्कि लोकतंत्र की उस नैतिक चेतना को भी लग सकता है, जो धीरे-धीरे सत्ता की चकाचौंध में धुंधली होती जा रही है। यदि राजनीति को सचमुच जनता की सेवा का माध्यम बनाना है, तो सिद्धांतों की वापसी, जनादेश का सम्मान और राजनीतिक ईमानदारी को पुनः स्थापित करना होगा। अन्यथा लोकतंत्र का यह महान उत्सव धीरे-धीरे एक ऐसे तमाशे में बदल जाएगा, जहां मंच पर अभिनेता बदलते रहेंगे, लेकिन दर्शक बनी जनता के हिस्से में केवल निराशा ही आएगी।
लेखक का परिचय
अशोक कुमार झा देश के वरिष्ठ पत्रकारों और सामाजिक-राजनीतिक विश्लेषकों में अपनी विशिष्ट पहचान रखते हैं। वे "रांची दस्तक" एवं "PSA Live News" के प्रधान संपादक हैं। तीन दशकों से अधिक समय से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय अशोक कुमार झा राष्ट्रीय सुरक्षा, राजनीति, सामाजिक न्याय, ग्रामीण विकास, प्रशासनिक जवाबदेही, जनहित के मुद्दों और समसामयिक घटनाओं पर निर्भीक एवं तथ्याधारित लेखन के लिए जाने जाते हैं। उनके लेख अनेक प्रतिष्ठित समाचार पत्रों और डिजिटल मंचों पर प्रकाशित होते रहे हैं। जनसरोकारों से जुड़े मुद्दों को बेबाकी से उठाना और सत्ता से सवाल पूछना उनकी पत्रकारिता की पहचान है। उनका मानना है कि "पत्रकारिता केवल खबर देने का माध्यम नहीं, बल्कि समाज और लोकतंत्र के प्रति जवाबदेही निभाने का सबसे बड़ा दायित्व है।"
Reviewed by PSA Live News
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12:46:00 pm
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