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1868 करोड़ का एलिवेटेड या 500 करोड़ में तीन फ्लाईओवर? दरभंगा के विकास पर पुनर्विचार की आवश्यकता



लेखक : अशोक कुमार झा
प्रधान संपादक – राँची दस्तक हिंदी साप्ताहिक एवं PSA Live News
वरिष्ठ पत्रकारसामाजिक चिंतक एवं पिछले तीन दशकों से अधिक समय से राजनीतिक,  सामाजिकप्रशासनिकन्यायिकमानवाधिकार एवं भ्रष्टाचार संबंधी विषयों पर सक्रिय लेखकविश्लेषक और जनचिंतक

विकास किसी भी शहर की पहचान होता है। चौड़ी सड़कें, आधुनिक यातायात व्यवस्था, बेहतर सार्वजनिक सुविधाएं और भविष्य की आवश्यकताओं के अनुरूप तैयार की गई योजनाएं किसी भी नगर को नई दिशा देती हैं। लेकिन विकास का वास्तविक अर्थ केवल बड़ी-बड़ी परियोजनाएं खड़ी करना नहीं है। विकास वह है जो आम नागरिक के जीवन को सरल बनाए, व्यापार को गति दे, शहर की अर्थव्यवस्था को मजबूत करे और जनता के धन का अधिकतम सदुपयोग सुनिश्चित करे।

इन दिनों दरभंगा में लगभग ₹1868 करोड़ की लागत से प्रस्तावित 10.5 किलोमीटर लंबे एलिवेटेड कॉरिडोर को लेकर व्यापक चर्चा चल रही है। इसे शहर की सबसे बड़ी आधारभूत संरचना परियोजनाओं में गिना जा रहा है। स्वाभाविक है कि इतनी बड़ी परियोजना से लोगों को बड़ी उम्मीदें भी हैं। लेकिन जब किसी योजना पर हजारों करोड़ रुपये खर्च किए जा रहे हों, तब उसका हर पहलू जनता के सामने स्पष्ट होना चाहिए और यदि बेहतर विकल्प उपलब्ध हों तो उन पर गंभीरता से विचार भी किया जाना चाहिए।

यह लेख किसी विकास कार्य का विरोध नहीं है, बल्कि जनहित में एक वैकल्पिक सोच प्रस्तुत करने का प्रयास है। लोकतंत्र में जनता के धन से बनने वाली योजनाओं पर प्रश्न उठाना, सुझाव देना और बेहतर विकल्प रखना स्वस्थ लोकतांत्रिक परंपरा का हिस्सा है।

दरभंगा उत्तर बिहार का प्रमुख शैक्षणिक, सांस्कृतिक, धार्मिक और व्यावसायिक केंद्र है। यहां प्रतिदिन हजारों लोग शिक्षा, स्वास्थ्य, व्यापार और प्रशासनिक कार्यों के लिए आते हैं। शहर का विस्तार लगातार हो रहा है। वाहनों की संख्या बढ़ रही है और कई प्रमुख मार्गों पर जाम अब सामान्य समस्या बन चुका है। ऐसे में यातायात व्यवस्था को बेहतर बनाना समय की मांग है।

लेकिन सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या प्रस्तावित एलिवेटेड वास्तव में शहर की प्रमुख आबादी और व्यावसायिक क्षेत्रों को राहत देगा?

यदि उपलब्ध प्रस्ताव को देखा जाए तो यह कॉरिडोर शहर के अनेक महत्वपूर्ण क्षेत्रों—दोनार, अलापट्टी, बेंता, लहेरियासराय, टावर चौक तथा अन्य घनी आबादी वाले हिस्सों—को सीधे तौर पर नहीं जोड़ता। जबकि यही वे इलाके हैं जहां प्रतिदिन सबसे अधिक यातायात का दबाव रहता है। यदि शहर की सबसे बड़ी आबादी ही इस परियोजना के प्रत्यक्ष लाभ से वंचित रह जाए तो योजना की उपयोगिता पर स्वाभाविक रूप से प्रश्न उठेंगे।

दरभंगा रेलवे स्टेशन पूरे मिथिलांचल की जीवनरेखा है। प्रतिदिन हजारों यात्री यहां से यात्रा करते हैं। यदि रेलवे स्टेशन तक सुगम संपर्क ही सुनिश्चित नहीं हो पा रहा हो, भूमि की उपलब्धता सीमित हो और एलिवेटेड स्टेशन की वास्तविक समस्या का समाधान न करता हो, तो यह चिंता का विषय है।

दूसरी ओर, यह भी ध्यान देने योग्य है कि दरभंगा में पहले से ही चार लेन रिंग रोड विकसित हो चुका है। समस्तीपुर, बेनीपुर, बहेरी, आईटीआई, आमस, शोभन और एकमी की दिशा से आने-जाने वाले भारी वाहन अब शहर के अंदर प्रवेश किए बिना अपने गंतव्य तक पहुंच सकते हैं। सौभन-एकमी बाईपास और राष्ट्रीय राजमार्ग-57 से जुड़ाव ने बाहरी यातायात का काफी दबाव पहले ही कम कर दिया है।

ऐसी स्थिति में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब बाहरी यातायात के लिए पर्याप्त व्यवस्था पहले से मौजूद है, तब क्या शहर के ऊपर से गुजरने वाला इतना महंगा एलिवेटेड ही एकमात्र विकल्प है?

यहां पटना का उदाहरण अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है। राजधानी पटना में अटल पथ का निर्माण शहर की वास्तविक जरूरतों को ध्यान में रखकर किया गया। इस परियोजना ने शहर के अंदरूनी हिस्सों को जोड़ा, यात्रा समय कम किया और लाखों लोगों को प्रत्यक्ष लाभ पहुंचाया। वहीं दूसरी ओर, रिंग रोड और बाहरी एलिवेटेड परियोजनाओं के माध्यम से बाहरी यातायात को शहर से अलग किया गया। जहां जाम अधिक था वहां फ्लाईओवर बनाए गए।

अर्थात पटना में विकास का मॉडल स्थानीय आवश्यकता के अनुसार तैयार किया गया, न कि केवल बड़ी परियोजना बनाने के उद्देश्य से।

यदि यही मॉडल दरभंगा में अपनाया जाए तो अपेक्षाकृत कम लागत में कहीं अधिक लोगों को लाभ पहुंचाया जा सकता है।

आज के निर्माण लागत के आधार पर लगभग ₹500 करोड़ में दरभंगा शहर के भीतर तीन अत्यंत महत्वपूर्ण फ्लाईओवर विकसित किए जा सकते हैं।

पहला फ्लाईओवर गेहूंमी-पीटीसी मार्ग पर बनाया जा सकता है। इससे एयरपोर्ट मार्ग, हसन चक और शिवधारा क्षेत्र का यातायात सुगम होगा।

दूसरा फ्लाईओवर दोनार-बेंता मार्ग पर बनाया जा सकता है। यह शहर का सबसे व्यस्त बाजार क्षेत्र है। यहां अस्पताल, विद्यालय, व्यापारिक प्रतिष्ठान और घनी आबादी है। प्रतिदिन लगने वाला जाम इस क्षेत्र की सबसे बड़ी समस्या है।

तीसरा फ्लाईओवर आयकर चौराहा से जिला स्कूल मार्ग तक बनाया जा सकता है। यहां कचहरी, सरकारी कार्यालय, शैक्षणिक संस्थान और बाजार होने के कारण भारी ट्रैफिक रहता है। फ्लाईओवर बनने से पूरे क्षेत्र को स्थायी राहत मिल सकती है।

इन तीनों परियोजनाओं का सबसे बड़ा लाभ यह होगा कि ये सीधे शहर की सबसे अधिक आबादी वाले हिस्सों को राहत देंगी। लाखों नागरिकों का समय बचेगा, व्यापार प्रभावित नहीं होगा और स्थानीय अर्थव्यवस्था को नई गति मिलेगी।

इसके विपरीत ₹1868 करोड़ की परियोजना का निर्माण यदि पांच वर्षों तक चलता है तो इसका प्रभाव दुकानदारों, छोटे व्यापारियों, रिक्शा चालकों, ठेला संचालकों और आम नागरिकों पर पड़ेगा। लंबे समय तक निर्माण कार्य, धूल, जाम और मार्ग अवरोध शहर की आर्थिक गतिविधियों को प्रभावित कर सकते हैं। इसलिए परियोजना की सामाजिक और आर्थिक लागत का भी गंभीर मूल्यांकन आवश्यक है।

यह भी ध्यान रखना होगा कि विकास का उद्देश्य केवल कंक्रीट के ढांचे खड़े करना नहीं, बल्कि नागरिकों की सुविधा बढ़ाना है। यदि कम लागत में अधिक लोगों को लाभ पहुंचाने वाला विकल्प उपलब्ध है, तो उसे केवल इसलिए नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए कि बड़ी परियोजना पहले से प्रस्तावित है।

लोकतंत्र की खूबसूरती यही है कि योजनाएं जनता के लिए बनती हैं, जनता पर नहीं थोपी जातीं। यदि विशेषज्ञों, अभियंताओं, नगर योजनाकारों, व्यापारिक संगठनों और नागरिक समाज की राय लेकर परियोजना को और बेहतर बनाया जा सकता है, तो ऐसा अवश्य किया जाना चाहिए।

दरभंगा मिथिला की सांस्कृतिक धरोहर है। यहां का विकास केवल सड़कों का निर्माण नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के भविष्य का निर्माण है। इसलिए प्रत्येक निर्णय दूरदर्शिता, पारदर्शिता और जनभागीदारी के आधार पर होना चाहिए।

सरकार को चाहिए कि इस परियोजना का स्वतंत्र तकनीकी एवं आर्थिक मूल्यांकन कराया जाए। यदि आवश्यक हो तो विस्तृत जनसुनवाई आयोजित की जाए। शहर के नागरिकों, व्यापारिक संगठनों, अभियंताओं, यातायात विशेषज्ञों और सामाजिक संगठनों से सुझाव लिए जाएं। इससे जो भी अंतिम निर्णय होगा, वह अधिक स्वीकार्य और जनहितकारी होगा।

अंततः उद्देश्य किसी परियोजना का विरोध करना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि जनता के ₹1868 करोड़ का निवेश वास्तव में दरभंगा के प्रत्येक नागरिक के जीवन को बेहतर बनाए। यदि ₹500 करोड़ में तीन महत्वपूर्ण फ्लाईओवर बनाकर शहर के अधिकांश ट्रैफिक जाम का समाधान संभव है, तो इस विकल्प पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए।

दरभंगा को विकास चाहिए, लेकिन ऐसा विकास जो शहर को जोड़े, व्यापार को बढ़ाए, जनता को राहत दे और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक बेहतर शहरी ढांचा तैयार करे। विकास का सही मॉडल वही है जिसमें कम लागत में अधिक लोगों को अधिक लाभ मिले। यही सुशासन की कसौटी है और यही जनहित का मार्ग भी।

जनता का पैसा जनता की अमानत है। इसलिए हर निर्णय सोच-समझकर, दूरदर्शिता के साथ और व्यापक जनहित को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए लिया जाना चाहिए।


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