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आख़िर कहाँ जा रहे हैं हम?

राष्ट्र सर्वोपरि है—लोकतंत्र की आड़ में अराजकता, हिंसा और कानून की अवहेलना किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं की जा सकती

लेखक : अशोक कुमार झा
प्रधान संपादक – राँची दस्तक हिंदी साप्ताहिक एवं PSA Live News

वरिष्ठ पत्रकारसामाजिक चिंतक एवं पिछले तीन दशकों से अधिक समय से राजनीतिक,  सामाजिकप्रशासनिकन्यायिकमानवाधिकार एवं भ्रष्टाचार संबंधी विषयों पर सक्रिय लेखकविश्लेषक और जनचिंतक

जब-जब राष्ट्र किसी कठिन दौर से गुजरता है, तब-तब इतिहास अपने नागरिकों की परीक्षा लेता है। यह परीक्षा केवल सरकारों की नहीं होती, बल्कि समाज, युवाओं, बुद्धिजीवियों, मीडिया और प्रत्येक जिम्मेदार नागरिक की भी होती है। आज भारत एक ऐसे दौर से गुजर रहा है, जहाँ एक ओर लोकतंत्र की शक्ति दुनिया के सामने मिसाल बन रही है, वहीं दूसरी ओर यह चिंता भी बढ़ रही है कि कहीं लोकतंत्र के नाम पर ऐसी प्रवृत्तियाँ तो नहीं पनप रहीं जो समाज को टकराव, अविश्वास और अराजकता की ओर ले जाएँ।

भारत का संविधान प्रत्येक नागरिक को अपनी बात रखने, सरकार की आलोचना करने और शांतिपूर्ण आंदोलन करने का अधिकार देता है। लेकिन संविधान कहीं भी हिंसा, कानून हाथ में लेने, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाने, महिलाओं का अपमान करने, पत्रकारों को डराने या सुरक्षा बलों पर हमला करने की अनुमति नहीं देता। यही वह सीमा है जहाँ लोकतांत्रिक आंदोलन समाप्त होता है और कानून अपना दायित्व निभाना शुरू करता है।

आज पूरे देश में अनेक घटनाओं को लेकर बहस हो रही है। प्रश्न केवल किसी एक आंदोलन या संगठन का नहीं है, बल्कि उस सोच का है जो युवाओं को यह विश्वास दिलाती है कि परिवर्तन का मार्ग केवल टकराव से होकर गुजरता है। यह सोच लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं है। भारत का इतिहास बताता है कि सबसे बड़े परिवर्तन सत्य, संवाद, अनुशासन और जनविश्वास से आए हैं, न कि भय और हिंसा से।

राष्ट्र पहले, राजनीति बाद में

किसी भी राजनीतिक दल, विचारधारा या संगठन से ऊपर यदि कोई चीज़ है तो वह राष्ट्र है। सरकारें बदलती हैं, सत्ता बदलती है, चेहरे बदलते हैं, लेकिन राष्ट्र और उसका संविधान स्थायी रहते हैं। यदि राष्ट्र ही कमजोर हो गया तो किसी भी विचारधारा की विजय का कोई अर्थ नहीं बचेगा।

इसलिए प्रत्येक नागरिक, प्रत्येक छात्र, प्रत्येक पत्रकार, प्रत्येक सामाजिक संगठन और प्रत्येक राजनीतिक दल का पहला दायित्व होना चाहिए कि वह राष्ट्रहित को सर्वोच्च रखे। मतभेद लोकतंत्र की शक्ति हैं, लेकिन राष्ट्रविरोध, हिंसा और अराजकता कभी भी लोकतंत्र की पहचान नहीं हो सकते।

आंदोलन और भीड़तंत्र में अंतर समझना होगा

स्वतंत्रता आंदोलन के महानायक जेल गए, लाठियाँ खाईं, यातनाएँ सहीं, लेकिन उन्होंने राष्ट्र की संपत्ति नहीं जलाई। उन्होंने जनता को जोड़ने का काम किया, तोड़ने का नहीं। उन्होंने अनुशासन का मार्ग चुना। यही कारण है कि उनका आंदोलन इतिहास में सम्मान के साथ याद किया जाता है।

आज भी यदि कोई आंदोलन जनता की वास्तविक समस्याओं को शांतिपूर्ण और संवैधानिक तरीके से उठाता है तो उसका सम्मान होना चाहिए। लेकिन यदि किसी भी आंदोलन के दौरान हिंसा, कानून-व्यवस्था भंग करने, महिलाओं के सम्मान को ठेस पहुँचाने, पत्रकारों के साथ दुर्व्यवहार या सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाने जैसी घटनाएँ सामने आती हैं, तो उन घटनाओं की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और दोषियों को कानून के अनुसार दंड मिलना चाहिए। किसी भी उद्देश्य के नाम पर अपराध स्वीकार नहीं किया जा सकता।

युवाओं की सबसे बड़ी शक्ति—और सबसे बड़ी जिम्मेदारी

भारत दुनिया का सबसे युवा देश है। यही युवा भारत को विश्वगुरु भी बना सकते हैं और यदि उनकी ऊर्जा गलत दिशा में चली जाए तो वही सबसे बड़ी चुनौती भी बन सकती है। इसलिए युवाओं को सबसे पहले यह समझना होगा कि भावनाओं से अधिक महत्वपूर्ण तथ्य होते हैं। नारों से अधिक महत्वपूर्ण राष्ट्र निर्माण होता है। क्रोध से अधिक शक्तिशाली ज्ञान होता है।

जो हाथ देश के उद्योग, विज्ञान, सेना, कृषि, शिक्षा, चिकित्सा और नवाचार को मजबूत कर सकते हैं, वे यदि केवल टकराव में उलझ जाएँ, तो सबसे बड़ी क्षति उसी पीढ़ी की होती है।

मीडिया का धर्म क्या है?

लोकतंत्र में मीडिया को चौथा स्तंभ इसलिए कहा जाता है क्योंकि उसका दायित्व केवल खबर दिखाना नहीं, बल्कि सत्य की खोज करना है। पत्रकारिता का उद्देश्य न किसी सरकार का प्रचार करना है और न किसी आंदोलन का। उसका उद्देश्य है—जनता को तथ्य देना, प्रश्न पूछना और सत्ता तथा समाज दोनों को जवाबदेह बनाना।

यदि किसी आंदोलन के दौरान सकारात्मक बातें हैं तो उन्हें दिखाया जाना चाहिए। यदि किसी आंदोलन के दौरान कानून-विरोधी घटनाओं, हिंसा, महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार या पत्रकारों पर हमले जैसे आरोप सामने आते हैं, तो उनकी भी निष्पक्ष जांच और रिपोर्टिंग होनी चाहिए। मीडिया का दायित्व तथ्यों को सामने लाना है, निर्णय सुनाना नहीं।

महिलाओं का सम्मान किसी भी विचारधारा से बड़ा है

किसी भी आंदोलन की सबसे बड़ी परीक्षा यह होती है कि वह महिलाओं के प्रति कितना संवेदनशील है। यदि किसी महिला के साथ छेड़छाड़, अभद्रता या यौन उत्पीड़न जैसी घटना होती है, तो यह केवल एक महिला का नहीं बल्कि पूरे समाज का अपमान है। ऐसी घटनाओं में दोषियों के विरुद्ध निष्पक्ष जांच और कठोर कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए। महिला सम्मान पर कोई समझौता नहीं हो सकता।

सुरक्षा बलों का सम्मान भी आवश्यक

हमारे पुलिसकर्मी और सुरक्षा बल भी इसी समाज के नागरिक हैं। वे अपने परिवारों से दूर रहकर कानून-व्यवस्था बनाए रखने का कार्य करते हैं। यदि कहीं कानून-व्यवस्था बिगड़ती है, तो उन्हें कठिन परिस्थितियों में निर्णय लेने पड़ते हैं। साथ ही यह भी आवश्यक है कि वे कानून के दायरे में रहकर कार्य करें और यदि कहीं शक्ति के दुरुपयोग के आरोप हों तो उनकी भी निष्पक्ष जांच हो। लोकतंत्र में जवाबदेही सभी पक्षों की होती है।

सोशल मीडिया का दौर और जिम्मेदारी

आज एक वीडियो, एक पोस्ट या एक अफवाह कुछ ही मिनटों में लाखों लोगों तक पहुँच जाती है। ऐसे समय में सबसे बड़ी जिम्मेदारी नागरिकों की है कि वे बिना सत्यापन के किसी भी सूचना को आगे न बढ़ाएँ। झूठी सूचनाएँ समाज में अविश्वास और तनाव पैदा कर सकती हैं। राष्ट्र निर्माण तथ्यों से होता है, अफवाहों से नहीं।

आज देश को क्या चाहिए?

देश को ऐसे युवा चाहिए जो रोजगार पैदा करें, स्टार्टअप खड़े करें, शोध करें, सेना में जाएँ, प्रशासन में जाएँ, किसान और मजदूर की समस्याओं का समाधान खोजें, नई तकनीक विकसित करें और समाज को जोड़ने का कार्य करें। भारत का भविष्य ईंटें तोड़ने में नहीं, बल्कि नए भारत की इमारत खड़ी करने में है।

आज आवश्यकता यह नहीं कि हम एक-दूसरे को दुश्मन मान लें। आवश्यकता यह है कि हम राष्ट्र को सबसे ऊपर रखें। यदि किसी भी आंदोलन, संगठन, संस्था या व्यक्ति द्वारा कानून का उल्लंघन किया जाता है, हिंसा की जाती है या अपराध किया जाता है, तो उसका निर्णय कानून करेगा और दोषियों पर कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए। यही लोकतंत्र का मार्ग है।

अंततः हमें स्वयं से एक प्रश्न अवश्य पूछना चाहिए—क्या हमारे शब्द, हमारे कार्य और हमारे निर्णय राष्ट्र को मजबूत कर रहे हैं या कमजोर? यदि उत्तर पहला है, तो हम सही दिशा में हैं। यदि उत्तर दूसरा है, तो आत्ममंथन की आवश्यकता है।

भारत किसी एक दल, एक नेता या एक विचारधारा का नहीं है। यह उन करोड़ों देशवासियों का है जिन्होंने अपने श्रम, त्याग और बलिदान से इसे बनाया है। इसलिए हमारा पहला और अंतिम संकल्प यही होना चाहिए—

राष्ट्र सर्वोपरि था, राष्ट्र सर्वोपरि है और राष्ट्र सर्वोपरि रहेगा। लोकतंत्र की रक्षा भी होगी, संविधान का सम्मान भी होगा और कानून का शासन भी सर्वोच्च रहेगा। यही एक सशक्त, सुरक्षित और विकसित भारत की पहचान है।

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