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क्या बिहार में कानून से ऊपर हो गई है पुलिस? कदमकुआँ थाने से उठता एक बड़ा सवाल और लोकतंत्र की कसौटी पर खड़ी व्यवस्था


बिहार की राजधानी पटना के कदमकुआँ थाना परिसर में धरने पर बैठे शिक्षक एवं चर्चित शिक्षाविद् रौशन सर की तस्वीर ने पूरे बिहार ही नहीं, बल्कि देशभर में कानून व्यवस्था को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है। दावा किया जा रहा है कि वे खान सर के विरुद्ध शिकायत दर्ज कराने पहुंचे थे, लेकिन थाना प्रभारी ने न केवल प्राथमिकी दर्ज करने से इनकार किया, बल्कि उनका आवेदन तक लेने को तैयार नहीं हुए। यदि यह दावा तथ्यात्मक रूप से सही है, तो यह केवल दो व्यक्तियों के बीच का विवाद नहीं रह जाता, बल्कि यह भारतीय न्याय व्यवस्था, पुलिस प्रशासन और नागरिक अधिकारों से जुड़ा अत्यंत गंभीर प्रश्न बन जाता है।

लोकतांत्रिक व्यवस्था में पुलिस का दायित्व किसी व्यक्ति विशेष, किसी राजनीतिक दल अथवा किसी प्रभावशाली वर्ग के प्रति नहीं, बल्कि संविधान और कानून के प्रति होता है। प्रत्येक नागरिक को यह अधिकार प्राप्त है कि यदि उसके साथ कोई कथित अपराध हुआ है तो वह पुलिस के समक्ष शिकायत प्रस्तुत करे। पुलिस शिकायत का परीक्षण कर विधि के अनुसार निर्णय ले सकती है, लेकिन शिकायत लेने से ही इनकार कर देना या आवेदन स्वीकार न करना, यदि ऐसा हुआ है, तो यह नागरिकों के मन में अनेक प्रकार के प्रश्न उत्पन्न करता है।

आज सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि रौशन सर सही हैं या खान सर सही हैं। इसका निर्णय अदालत और विधिक प्रक्रिया करेगी। वास्तविक प्रश्न यह है कि क्या बिहार में किसी भी नागरिक की शिकायत सुनना भी अब पुलिस की इच्छा पर निर्भर हो गया है? यदि कोई थाना आवेदन लेने से इनकार कर दे, तो आम नागरिक आखिर न्याय की पहली सीढ़ी तक कैसे पहुंचेगा?

भारतीय न्याय व्यवस्था का मूल सिद्धांत है कि किसी भी व्यक्ति को न्याय पाने का अवसर मिलना चाहिए। प्राथमिकी दर्ज करना या शिकायत स्वीकार करना दोष सिद्ध करना नहीं होता। यह केवल विधिक प्रक्रिया की शुरुआत होती है। जांच के बाद यदि आरोप असत्य पाए जाते हैं तो मामला समाप्त हो सकता है। लेकिन यदि शिकायत दर्ज ही न हो, तो जांच का अवसर भी समाप्त हो जाता है। यही स्थिति लोकतंत्र के लिए सबसे अधिक चिंताजनक होती है।

यह घटना एक व्यापक बहस को जन्म देती है कि क्या बिहार पुलिस पर राजनीतिक, सामाजिक अथवा अन्य प्रकार का प्रभाव इतना बढ़ गया है कि वह अपने विवेक के बजाय किसी अन्य आधार पर निर्णय लेने लगी है? या फिर यह केवल एक अलग-थलग प्रशासनिक घटना है? इन प्रश्नों के उत्तर निष्पक्ष जांच के बिना नहीं दिए जा सकते, लेकिन जब ऐसी घटनाएं लगातार चर्चा का विषय बनती हैं तो जनता के मन में स्वाभाविक रूप से व्यवस्था के प्रति संशय उत्पन्न होता है।

जनता यह भी पूछ रही है कि यदि राजधानी पटना में, मीडिया और सोशल मीडिया की निगाहों के सामने, किसी व्यक्ति को आवेदन देने के लिए धरने पर बैठना पड़े, तो दूरदराज के गांवों और कस्बों में रहने वाले सामान्य नागरिक की स्थिति क्या होगी? जिनके पास न मीडिया है, न प्रभाव, न संसाधन—वे न्याय कैसे प्राप्त करेंगे?

इस पूरे प्रकरण ने पुलिस की जवाबदेही पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न लगाया है। पुलिस केवल अपराधियों को पकड़ने वाली संस्था नहीं है, बल्कि वह नागरिकों और राज्य के बीच विश्वास की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है। यदि नागरिक का विश्वास पुलिस से उठने लगे, तो कानून व्यवस्था की पूरी संरचना कमजोर पड़ने लगती है।

यह भी आवश्यक है कि इस मामले को राजनीतिक चश्मे से देखने के बजाय संवैधानिक दृष्टिकोण से देखा जाए। यदि पुलिस ने विधि के अनुसार कार्य किया है, तो उसे सार्वजनिक रूप से कारण स्पष्ट करना चाहिए। यदि किसी प्रक्रिया के कारण तत्काल प्राथमिकी दर्ज नहीं की जा सकती थी, तो उसकी जानकारी शिकायतकर्ता को दी जानी चाहिए थी। पारदर्शिता ही विश्वास का आधार होती है।

ऐसे मामलों में राज्य सरकार की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो जाती है। गृह विभाग और वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों का दायित्व है कि वे पूरे मामले की निष्पक्ष समीक्षा करें। यदि कहीं प्रक्रिया का उल्लंघन हुआ है तो उसके लिए जिम्मेदारी तय होनी चाहिए, और यदि पुलिस ने नियमों के अनुरूप कार्य किया है तो उसे भी तथ्यों सहित सार्वजनिक किया जाना चाहिए। लोकतंत्र में अस्पष्टता हमेशा अविश्वास को जन्म देती है।

समाज के एक बड़े वर्ग के मन में यह प्रश्न भी उठ रहा है कि क्या पुलिस पूरी तरह कानून और सरकार के नियंत्रण में कार्य कर रही है, अथवा कहीं ऐसी धारणा बनती जा रही है कि पुलिस अपनी स्वतंत्र इच्छा से निर्णय ले रही है? इस प्रकार के प्रश्न जनता के मन में अवश्य उठ सकते हैं, लेकिन इनके उत्तर तथ्यों, जांच और आधिकारिक स्पष्टीकरण के आधार पर ही मिलने चाहिए। बिना प्रमाण यह कहना उचित नहीं होगा कि सरकार ने कोई मौखिक निर्देश दिया है या पुलिस सरकार से ऊपर हो गई है। किंतु यह भी उतना ही सत्य है कि यदि समय रहते ऐसे मामलों का पारदर्शी समाधान न किया जाए, तो अफवाहें और अविश्वास दोनों बढ़ते हैं।

लोकतंत्र में सबसे बड़ी शक्ति जनता का विश्वास होता है। न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए, बल्कि होता हुआ दिखाई भी देना चाहिए। यदि शिकायतकर्ता को अपनी बात रखने का अवसर ही न मिले, तो न्याय व्यवस्था पर लोगों का भरोसा कमजोर पड़ने लगता है। यही कारण है कि पुलिस सुधार, जवाबदेही, डिजिटल शिकायत व्यवस्था, सीसीटीवी निगरानी और समयबद्ध शिकायत निस्तारण जैसे विषय बार-बार राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बनते रहे हैं।

बिहार सरकार को इस पूरे मामले में शीघ्र और निष्पक्ष कार्रवाई सुनिश्चित करनी चाहिए। यदि आवेदन लेने में लापरवाही हुई है तो संबंधित अधिकारियों से जवाब मांगा जाना चाहिए। यदि शिकायत निराधार है तो उसकी जांच कर स्पष्ट रिपोर्ट सार्वजनिक की जानी चाहिए। दोनों ही स्थितियों में पारदर्शिता ही समाधान का सबसे प्रभावी माध्यम है।

आज आवश्यकता किसी व्यक्ति विशेष के पक्ष या विपक्ष में खड़े होने की नहीं, बल्कि संविधान और कानून के पक्ष में खड़े होने की है। चाहे शिकायतकर्ता रौशन सर हों, खान सर हों या कोई सामान्य नागरिक—सभी के लिए कानून की प्रक्रिया समान होनी चाहिए। यही लोकतंत्र की आत्मा है और यही संविधान की भावना भी।

यह घटना केवल एक थाने की घटना नहीं रह गई है। यह उस विश्वास की परीक्षा बन गई है, जो जनता पुलिस, प्रशासन और सरकार पर करती है। उम्मीद की जानी चाहिए कि संबंधित अधिकारी इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कर जनता के सभी प्रश्नों का स्पष्ट उत्तर देंगे, ताकि लोकतांत्रिक व्यवस्था में नागरिकों का विश्वास और मजबूत हो, न कि कमजोर।

लेखक परिचय
अशोक कुमार झा
प्रधान संपादक – रांची दस्तक (हिंदी साप्ताहिक) एवं PSA Live News। वरिष्ठ पत्रकार, सामाजिक चिंतक एवं तीन दशकों से अधिक समय से जनसरोकार, सुशासन, लोकतंत्र, प्रशासनिक जवाबदेही तथा राष्ट्रीय विषयों पर सक्रिय लेखन।

क्या बिहार में कानून से ऊपर हो गई है पुलिस? कदमकुआँ थाने से उठता एक बड़ा सवाल और लोकतंत्र की कसौटी पर खड़ी व्यवस्था क्या बिहार में कानून से ऊपर हो गई है पुलिस? कदमकुआँ थाने से उठता एक बड़ा सवाल और लोकतंत्र की कसौटी पर खड़ी व्यवस्था Reviewed by PSA Live News on 1:08:00 pm Rating: 5

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