एक युवा के आत्मदाह से उठी लपटों ने भारतीय राजनीति, सामाजिक न्याय और छात्र आंदोलनों की दिशा बदल दी
भारतीय लोकतंत्र का इतिहास केवल संसद में बने कानूनों, सरकारों के फैसलों और चुनावी परिणामों का इतिहास नहीं है। यह उन करोड़ों लोगों की भावनाओं, संघर्षों, असहमतियों और उम्मीदों का भी इतिहास है, जिन्होंने अलग-अलग समय पर देश की राजनीतिक दिशा को प्रभावित किया। वर्ष 1990 का मंडल आंदोलन इसी इतिहास का एक ऐसा अध्याय है, जिसने भारतीय राजनीति और समाज को गहरे तक प्रभावित किया। इस आंदोलन के अनेक चेहरे थे, अनेक विचार थे और अनेक पक्ष थे, लेकिन यदि किसी एक घटना ने उस दौर के छात्र आक्रोश को देश के सामने सबसे तीखे रूप में रखा, तो वह थी दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र राजीव गोस्वामी का आत्मदाह का प्रयास। 19 सितंबर 1990 को नई दिल्ली में अपने शरीर को आग के हवाले करने की उनकी कोशिश ने पूरे देश को झकझोर दिया। वह बच तो गए, लेकिन उस दिन लगी आग ने उनके शरीर और जीवन पर ऐसे निशान छोड़े, जो उनकी मृत्यु तक उनके साथ रहे।
राजीव गोस्वामी की कहानी को केवल मंडल आयोग के विरोध की कहानी के रूप में देखना उस दौर की जटिलता को बहुत छोटा कर देना होगा। यह कहानी उस समय के भारत के युवा मानस की बेचैनी, सरकारी नौकरियों के प्रति युवाओं की निर्भरता, सामाजिक न्याय की मांग, आरक्षण को लेकर पैदा हुए विरोध, छात्र राजनीति के उभार और राजनीतिक फैसलों के सामाजिक प्रभाव की कहानी भी है। यह एक ऐसी कहानी है जिसमें एक ओर ऐतिहासिक सामाजिक वंचना को दूर करने का सवाल था, तो दूसरी ओर प्रतियोगी परीक्षाओं और रोजगार के सीमित अवसरों को लेकर युवाओं की चिंता थी। दोनों पक्षों की अपनी आशंकाएं थीं और दोनों के पीछे उस समय के भारत की वास्तविक परिस्थितियां थीं। दुर्भाग्य यह रहा कि इस बहस का एक हिस्सा इतना उग्र हुआ कि कुछ युवाओं ने अपने जीवन को ही विरोध का हथियार बना लिया।
मंडल आयोग की पृष्ठभूमि स्वतंत्र भारत में सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों की स्थिति सुधारने की लंबे समय से चली आ रही बहस से जुड़ी थी। द्वितीय पिछड़ा वर्ग आयोग के अध्यक्ष बी. पी. मंडल के नाम पर प्रसिद्ध इस आयोग ने पिछड़े वर्गों की सामाजिक और शैक्षणिक स्थिति का अध्ययन किया तथा सरकारी सेवाओं में उनके प्रतिनिधित्व को बढ़ाने के लिए आरक्षण सहित कई उपायों की सिफारिश की। आयोग की रिपोर्ट कई वर्षों तक राजनीतिक निर्णय की प्रतीक्षा करती रही। वर्ष 1990 में प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार ने मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने की दिशा में निर्णायक कदम उठाया और केंद्रीय सरकारी नौकरियों में अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षण की घोषणा की। इस निर्णय ने भारतीय राजनीति में सामाजिक न्याय के प्रश्न को एक नई ऊंचाई दी, लेकिन साथ ही देश के एक बड़े हिस्से, विशेषकर सामान्य वर्ग के छात्रों और युवाओं में तीखा असंतोष भी पैदा किया।
उस समय सरकारी नौकरी केवल नौकरी नहीं थी। वह लाखों मध्यमवर्गीय और निम्न-मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए सामाजिक सुरक्षा, आर्थिक स्थिरता और सम्मानजनक भविष्य का सबसे बड़ा माध्यम थी। निजी क्षेत्र आज की तरह विस्तृत नहीं था। रोजगार के अवसर सीमित थे और प्रतियोगी परीक्षाओं में लाखों युवा कुछ हजार पदों के लिए संघर्ष करते थे। ऐसे वातावरण में आरक्षण संबंधी निर्णय को अनेक छात्रों ने अपने अवसरों पर सीधा प्रभाव डालने वाला फैसला माना। विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में विरोध शुरू हुआ। दिल्ली से लेकर देश के दूसरे हिस्सों तक छात्र सड़कों पर उतरने लगे। आंदोलन में नारे, प्रदर्शन और रैलियां बढ़ती गईं और धीरे-धीरे यह असहमति उग्र रूप लेने लगी।
इसी उथल-पुथल के बीच 19 सितंबर 1990 को राजीव गोस्वामी ने आत्मदाह का प्रयास किया। वह दिल्ली विश्वविद्यालय के देशबंधु कॉलेज के छात्र थे। उनके शरीर पर लगी आग को बुझाकर उन्हें अस्पताल पहुंचाया गया। उनकी स्थिति गंभीर थी और उनके शरीर का बड़ा हिस्सा जल गया था। उनके जलने की मात्रा को लेकर अलग-अलग समकालीन और बाद की रिपोर्टों में अलग-अलग आंकड़े सामने आए हैं, लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं कि चोटें अत्यंत गंभीर थीं। वह मृत्यु से बच गए, पर सामान्य जीवन की ओर उनकी वापसी आसान नहीं थी। उनके शरीर पर लगी आग की कीमत उन्हें वर्षों तक चुकानी पड़ी।
राजीव गोस्वामी की तस्वीरों ने पूरे देश को झकझोर दिया। आज के डिजिटल और सोशल मीडिया युग में किसी घटना का वायरल होना सामान्य बात लग सकता है, लेकिन 1990 में तस्वीरों और खबरों का देशभर में फैलना मुख्यतः अखबारों और टेलीविजन के माध्यम से होता था। इसके बावजूद राजीव की घटना राष्ट्रीय चर्चा का केंद्र बन गई। वह मंडल विरोधी आंदोलन के प्रतीक बन गए। उनके आत्मदाह के बाद अन्य स्थानों पर भी आत्मदाह के प्रयास हुए और कुछ युवाओं की जान चली गई। इस प्रकार एक व्यक्तिगत त्रासदी ने आंदोलन को और अधिक भावनात्मक तथा उग्र बना दिया। यही वह बिंदु है जहां इतिहास हमें सबसे गंभीर चेतावनी देता है—राजनीतिक असहमति लोकतंत्र की शक्ति है, लेकिन आत्मदाह जैसी कार्रवाई को विरोध के आदर्श माध्यम के रूप में कभी स्वीकार नहीं किया जा सकता।
राजीव गोस्वामी का बच जाना उनके संघर्ष का अंत नहीं था, बल्कि एक लंबे शारीरिक संघर्ष की शुरुआत थी। गंभीर जलने की चोटों ने उनके स्वास्थ्य को प्रभावित किया। शरीर की कमजोरी, इलाज और अस्पतालों के चक्कर उनके जीवन का हिस्सा बन गए। जिस युवा को 1990 में देश ने आंदोलन के सबसे बड़े चेहरों में से एक के रूप में देखा था, वही कुछ वर्षों बाद अपने स्वास्थ्य और रोजमर्रा के जीवन की चुनौतियों से लड़ रहा था। राजनीति और मीडिया की सुर्खियां धीरे-धीरे बदल गईं, लेकिन राजीव के शरीर पर उस घटना के निशान बने रहे।
आत्मदाह की घटना के बाद राजीव गोस्वामी छात्र राजनीति में भी सक्रिय हुए और दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ के अध्यक्ष पद तक पहुंचे। उनका राजनीतिक प्रभाव उस समय की उनकी लोकप्रियता को दर्शाता था। लेकिन उनका स्वास्थ्य उनका सबसे बड़ा अवरोध बना रहा। सार्वजनिक जीवन में सक्रिय रहना कठिन होता गया और अंततः उन्होंने राजनीति से दूरी बना ली। यहां राजीव की कहानी का एक महत्वपूर्ण और कम चर्चित पक्ष सामने आता है। आंदोलन का राष्ट्रीय चेहरा बनने के बाद उन्होंने अपना जीवन फिर से खड़ा करने के लिए व्यवसाय की राह चुनी।
उन्होंने टेलरिंग का काम शुरू किया और सिलाई मशीनों की असेंबली से जुड़े छोटे कारोबार में भी हाथ आजमाया। यह दृश्य अपने आप में अत्यंत मानवीय है। एक समय देश के अखबारों के पहले पन्ने पर जिस युवक की तस्वीर छपती थी, वही युवक बाद के वर्षों में अपने जीवनयापन के लिए सिलाई और मशीनों के कारोबार में जुटा था। राजनीतिक पहचान धीरे-धीरे पीछे छूट गई और रोजमर्रा की जिंदगी आगे आ गई। परिवार, कारोबार, स्वास्थ्य और अस्पताल—यही उनकी जिंदगी की वास्तविक चुनौतियां बन गईं। यह हमें यह भी बताता है कि किसी आंदोलन के समाप्त हो जाने के बाद उसके प्रमुख चेहरों का जीवन सामान्य नहीं हो जाता। आंदोलन की सुर्खियां भले खत्म हो जाएं, लेकिन चोटें और उनके परिणाम वर्षों तक व्यक्ति के साथ चलते हैं।
राजीव गोस्वामी का निधन 24 फरवरी 2004 को हुआ। उस समय वे बहुत अधिक उम्र के नहीं थे। उनके निधन के संबंध में प्रकाशित रिपोर्टों में उम्र के आंकड़ों में अंतर मिलता है, लेकिन यह निर्विवाद है कि उनका जीवन लंबा नहीं रहा। उनके स्वास्थ्य को लेकर लंबे समय से समस्याएं बनी हुई थीं और मृत्यु के समय लीवर तथा किडनी से जुड़ी गंभीर जटिलताओं का उल्लेख किया गया। इस तरह 19 सितंबर 1990 को शुरू हुआ संघर्ष लगभग डेढ़ दशक तक उनके जीवन की छाया बना रहा। एक युवा जिसने एक राजनीतिक निर्णय के विरोध में अपने शरीर को आग के हवाले किया था, अंततः अपने जीवन के अंतिम वर्षों तक उन चोटों के प्रभावों से जूझता रहा।
लेकिन राजीव गोस्वामी की कहानी को केवल व्यक्तिगत त्रासदी कहकर समाप्त नहीं किया जा सकता। मंडल आंदोलन ने भारतीय राजनीति को स्थायी रूप से बदल दिया। सामाजिक न्याय, पिछड़े वर्गों का प्रतिनिधित्व और सत्ता में भागीदारी भारतीय राजनीति के केंद्रीय मुद्दे बन गए। अनेक क्षेत्रीय राजनीतिक शक्तियों को मजबूती मिली। राजनीति में सामाजिक समीकरणों का महत्व बढ़ा। दूसरी ओर मंडल विरोधी आंदोलन ने भी एक नई राजनीतिक चेतना पैदा की। 1990 का दशक भारतीय राजनीति के पुनर्गठन का दौर बना और मंडल इस परिवर्तन के सबसे महत्वपूर्ण कारणों में से एक था।
मंडल के समर्थकों की मूल चिंता थी कि भारतीय समाज के उन वर्गों को सरकारी संस्थानों और नौकरियों में पर्याप्त प्रतिनिधित्व मिले, जिन्हें लंबे समय तक सामाजिक और शैक्षणिक अवसरों से वंचित रखा गया। दूसरी ओर मंडल विरोधी छात्रों की चिंता यह थी कि सीमित सरकारी नौकरियों में आरक्षण से उनकी प्रतिस्पर्धात्मक संभावनाएं कम हो जाएंगी। दोनों पक्षों के तर्कों को उस समय की सामाजिक परिस्थितियों में समझना आवश्यक है। लोकतंत्र की खूबसूरती यही है कि वह विरोधी विचारों को भी स्थान देता है। समस्या तब पैदा होती है जब बहस संवाद से निकलकर हिंसा और आत्मविनाश तक पहुंच जाती है।
तीन दशक से अधिक समय बाद आज मंडल आयोग के दौर को देखने पर एक बात स्पष्ट दिखाई देती है कि उस समय की बहस केवल आरक्षण की बहस नहीं थी। वह भारतीय समाज में अवसर, प्रतिनिधित्व और समानता की परिभाषा को लेकर संघर्ष था। सवाल यह था कि समानता का अर्थ क्या केवल सभी के लिए समान अवसर देना है, या उन लोगों को अतिरिक्त अवसर देना भी समानता का हिस्सा है जो ऐतिहासिक रूप से पीछे रह गए हैं? दूसरी ओर यह प्रश्न भी उतना ही महत्वपूर्ण था कि अवसरों की संख्या बढ़ाए बिना यदि हिस्सेदारी को लेकर संघर्ष बढ़ता है, तो युवाओं में असुरक्षा और प्रतियोगिता का दबाव किस तरह बढ़ेगा।
आज भी आरक्षण को लेकर बहस समाप्त नहीं हुई है। समय बदला है, अर्थव्यवस्था बदली है, रोजगार की प्रकृति बदली है और शिक्षा के अवसरों का विस्तार हुआ है, लेकिन सामाजिक न्याय और समान अवसर का प्रश्न अभी भी भारतीय लोकतंत्र के सामने है। इसलिए मंडल के इतिहास को किसी एक पक्ष की जीत या दूसरे पक्ष की हार के रूप में देखना उचित नहीं होगा। इतिहास का काम किसी घटना को नारे में बदलना नहीं, बल्कि उसकी पूरी जटिलता को समझना है।
राजीव गोस्वामी के जीवन से आज की पीढ़ी के लिए सबसे बड़ी सीख यही होनी चाहिए कि लोकतंत्र में असहमति आवश्यक है, लेकिन असहमति का रास्ता जीवन-विरोधी नहीं होना चाहिए। सरकार के फैसले से असहमति हो तो आंदोलन हो, ज्ञापन दिया जाए, न्यायालय का दरवाजा खटखटाया जाए, चुनावी राजनीति में सवाल उठाए जाएं, संसद और विधानसभाओं में बहस हो, विश्वविद्यालयों में विचार-विमर्श हो—लेकिन किसी भी परिस्थिति में आत्मदाह को राजनीतिक साहस का प्रतीक नहीं बनाया जाना चाहिए। जीवन किसी भी राजनीतिक मांग, विचार या आंदोलन से अधिक मूल्यवान है।
राजीव गोस्वामी की कहानी का एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि इतिहास अक्सर व्यक्ति को उसके सबसे चर्चित क्षण में कैद कर देता है। राजीव को भी लंबे समय तक उस तस्वीर से पहचाना गया जिसमें उनका शरीर आग की लपटों में घिरा था। लेकिन वह तस्वीर उनके पूरे जीवन का प्रतिनिधित्व नहीं करती। उस तस्वीर के पीछे एक छात्र था, एक बेटा था, एक राजनीतिक कार्यकर्ता था, एक व्यवसायी था और अंततः एक ऐसा व्यक्ति था जिसने गंभीर शारीरिक कठिनाइयों के बावजूद जीवन को आगे बढ़ाने की कोशिश की। इसलिए राजीव को केवल आत्मदाह की घटना से पहचानना उनके जीवन को छोटा कर देना है।
उनकी कहानी में भारतीय राजनीति की एक बड़ी विडंबना भी छिपी है। राजनीतिक आंदोलनों में युवा सबसे आगे दिखाई देते हैं। वे नारे लगाते हैं, रैलियां करते हैं, संघर्ष करते हैं और कई बार अपने भविष्य तक को दांव पर लगा देते हैं। लेकिन आंदोलन समाप्त होने के बाद राजनीतिक व्यवस्था आगे बढ़ जाती है और युवा अपने व्यक्तिगत जीवन की चुनौतियों में लौट जाते हैं। इसलिए राजनीतिक नेतृत्व और छात्र संगठनों की जिम्मेदारी है कि युवाओं के आक्रोश को रचनात्मक दिशा दें, न कि उसे ऐसी राह पर जाने दें जहां जीवन ही दांव पर लग जाए।
राजीव गोस्वामी को लेकर विचार अलग-अलग हो सकते हैं। उनके राजनीतिक विचारों से सहमति या असहमति हो सकती है। मंडल आयोग के समर्थन या विरोध को लेकर भी समाज में मतभेद रहेंगे। लेकिन उनके जीवन की त्रासदी पर राजनीति से ऊपर उठकर विचार करने की जरूरत है। एक युवा का अपने शरीर को आग के हवाले करना किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए चिंता का विषय है। यह उस समय के समाज और राजनीतिक नेतृत्व के लिए भी एक सवाल था कि आखिर युवाओं की बेचैनी किस स्तर तक पहुंच गई थी।
आज जब देश युवा शक्ति की बात करता है, तब राजीव गोस्वामी की कहानी को नए संदर्भ में पढ़ने की आवश्यकता है। युवा केवल आंकड़ा नहीं है। वह देश का भविष्य है। उसके पास सपने हैं, आकांक्षाएं हैं और रोजगार की चिंता है। यदि शिक्षा, रोजगार और अवसरों की कमी होगी, तो राजनीतिक और सामाजिक असंतोष बढ़ना स्वाभाविक है। इसलिए सरकारों का दायित्व केवल आरक्षण जैसी नीतियों पर निर्णय लेना ही नहीं, बल्कि शिक्षा और रोजगार के अवसरों का विस्तार करना भी है। जब अवसर बढ़ेंगे, तो अवसरों को लेकर संघर्ष का दबाव भी कम होगा।
मंडल आयोग के दौर की सबसे बड़ी सीख शायद यही है कि सामाजिक न्याय और अवसर की समानता को एक-दूसरे का विरोधी बनाकर नहीं देखा जाना चाहिए। पिछड़े वर्गों को न्याय और प्रतिनिधित्व मिलना जरूरी है, लेकिन साथ ही सभी युवाओं के लिए शिक्षा, कौशल और रोजगार के पर्याप्त अवसर पैदा करना भी उतना ही जरूरी है। किसी भी समाज में अवसरों की कमी को केवल हिस्सेदारी के सवाल से स्थायी रूप से हल नहीं किया जा सकता। हमें अवसरों का दायरा ही इतना बड़ा करना होगा कि युवा अपने भविष्य को लेकर निराश न हों।
राजीव गोस्वामी की मृत्यु को दो दशक से अधिक समय बीत चुका है। आज उनकी पीढ़ी के अनेक लोग राजनीति, प्रशासन, व्यवसाय और समाज में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। लेकिन राजीव की कहानी आज भी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वह हमें उस भारत की याद दिलाती है जिसमें एक सरकारी निर्णय ने समाज के भीतर गहरे तनाव को उजागर कर दिया था। उस तनाव ने एक युवा को आत्मदाह तक पहुंचाया और उसके बाद उसका पूरा जीवन बदल गया।
इतिहास में कुछ घटनाएं ऐसी होती हैं जिन्हें बार-बार याद करना जरूरी होता है, लेकिन इसलिए नहीं कि हम उन्हें दोहराएं। बल्कि इसलिए कि हम उनसे सीख सकें। राजीव गोस्वामी की कहानी भी ऐसी ही है। 19 सितंबर 1990 की आग को केवल मंडल विरोधी आंदोलन की राजनीतिक तस्वीर के रूप में नहीं, बल्कि लोकतंत्र के लिए एक चेतावनी के रूप में भी देखना चाहिए। असहमति को दबाया नहीं जाना चाहिए, लेकिन असहमति को आत्मविनाश तक भी नहीं पहुंचने देना चाहिए। सरकारों को संवेदनशील होना होगा, राजनीतिक दलों को जिम्मेदार होना होगा, छात्र संगठनों को संयमित होना होगा और समाज को यह समझना होगा कि किसी भी विचार की कीमत इंसानी जिंदगी से बड़ी नहीं हो सकती।
राजीव गोस्वामी की आग बुझ गई, लेकिन उससे उठे सवाल आज भी हमारे सामने हैं। सामाजिक न्याय कैसे सुनिश्चित हो? समान अवसर कैसे मिले? युवाओं के लिए पर्याप्त रोजगार कैसे पैदा हों? सरकारी नीतियों पर व्यापक संवाद कैसे हो? विरोध को लोकतांत्रिक और शांतिपूर्ण कैसे रखा जाए? और सबसे बड़ा सवाल—क्या हम ऐसी व्यवस्था बना पाए हैं जिसमें किसी युवा को अपनी बात मनवाने के लिए अपने जीवन को दांव पर लगाने की जरूरत ही न पड़े?
इन सवालों का जवाब इतिहास से भागकर नहीं, इतिहास को समझकर देना होगा।
राजीव गोस्वामी का जीवन हमें यह याद दिलाता है कि राजनीति में फैसले केवल आंकड़ों पर नहीं होते; उनका असर इंसानों के जीवन पर पड़ता है। एक सरकारी आदेश किसी के लिए सामाजिक न्याय का द्वार खोल सकता है और किसी दूसरे के लिए अवसर कम होने की आशंका पैदा कर सकता है। इसलिए लोकतंत्र की वास्तविक ताकत निर्णय लेने में जितनी है, उतनी ही संवाद करने में भी है।
राजीव गोस्वामी आज हमारे बीच नहीं हैं। लेकिन उनका जीवन भारतीय लोकतंत्र के उस कठिन दौर का दस्तावेज है, जब सामाजिक न्याय और अवसर की बहस ने देश की युवा पीढ़ी को दोराहे पर खड़ा कर दिया था। उनके जीवन को याद करने का सबसे जिम्मेदार तरीका उनके आत्मदाह को महिमामंडित करना नहीं, बल्कि यह संकल्प लेना है कि भविष्य में किसी भी युवा को अपनी असहमति व्यक्त करने के लिए अपने जीवन की कीमत न चुकानी पड़े।
मंडल का दौर बीत गया, राजनीति बदल गई, पीढ़ियां बदल गईं—लेकिन राजीव गोस्वामी की कहानी आज भी हमें यही सवाल पूछती है : क्या लोकतंत्र अपने युवाओं को इतना विश्वास दे सकता है कि वे आग नहीं, संवाद का रास्ता चुनें?
लेखक परिचय
अशोक कुमार झा वरिष्ठ पत्रकार, सामाजिक चिंतक एवं लेखक हैं। वे ‘रांची दस्तक’ हिंदी दैनिक समाचार पत्र एवं PSA लाइव न्यूज के प्रधान संपादक हैं। पत्रकारिता के माध्यम से वे सामाजिक सरोकारों, जनहित के मुद्दों, लोकतांत्रिक मूल्यों, प्रशासनिक जवाबदेही, सामाजिक न्याय तथा आम नागरिकों से जुड़े विषयों को प्रमुखता से उठाते रहे हैं।
वे अखिल भारतीय उपभोक्ता एवं मानवाधिकार संरक्षण परिषद के संस्थापक सह राष्ट्रीय अध्यक्ष तथा सर्वजन विकास पार्टी के संस्थापक सह राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं। सामाजिक एवं सार्वजनिक जीवन से जुड़े विभिन्न विषयों पर उनका लेखन व्यवस्था में पारदर्शिता, जवाबदेही और आम जनता के अधिकारों को केंद्र में रखता है।
उनके संपादकीय लेखों में समसामयिक राजनीतिक घटनाओं के साथ-साथ सामाजिक, प्रशासनिक, शैक्षणिक और जनहित के मुद्दों का विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण देखने को मिलता है। उनका मानना है कि पत्रकारिता का उद्देश्य केवल समाचार देना नहीं, बल्कि समाज के महत्वपूर्ण प्रश्नों को सामने लाना और लोकतांत्रिक विमर्श को मजबूत करना भी है।
— अशोक कुमार झा
प्रधान संपादक, रांची दस्तक एवं PSA लाइव न्यूज
संस्थापक सह राष्ट्रीय अध्यक्ष, अखिल भारतीय उपभोक्ता एवं मानवाधिकार संरक्षण परिषद
संस्थापक सह राष्ट्रीय अध्यक्ष, सर्वजन विकास पार्टी
वरिष्ठ पत्रकार एवं सामाजिक चिंतक
Reviewed by PSA Live News
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1:10:00 pm
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