माकपा ने कहा—युवाओं की जायज मांगों की जीत, चयन आयोगों में व्यापक सुधार के बिना पारदर्शी नियुक्ति संभव नहीं
रांची, 19 अगस्त 2026। झारखंड में जेपीएससी-जेएसएससी से जुड़े मुद्दों को लेकर लंबे समय से आंदोलनरत छात्र-युवाओं और राज्य सरकार के बीच हुए समझौते का भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) यानी माकपा ने स्वागत किया है। पार्टी ने कहा कि आंदोलनरत छात्र-युवाओं की कई महत्वपूर्ण और जायज मांगों को अंततः स्वीकार किया जाना लोकतांत्रिक आंदोलन की ताकत और सरकार के सकारात्मक रवैये का परिणाम है। माकपा ने आंदोलनरत युवाओं को उनके लगातार संघर्ष के लिए बधाई देते हुए मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन द्वारा बातचीत के माध्यम से समाधान की दिशा में पहल किए जाने को भी स्वागत योग्य कदम बताया है।
माकपा का कहना है कि सरकार और युवाओं के बीच हुआ यह समझौता केवल तत्कालिक विवाद को समाप्त करने का प्रयास नहीं माना जाना चाहिए, बल्कि इसे झारखंड की भर्ती और चयन व्यवस्था में व्यापक सुधार की शुरुआत के रूप में देखा जाना चाहिए। पार्टी के अनुसार राज्य के सरकारी सेवा चयन आयोगों तथा उनकी आंतरिक कार्यप्रणाली में वर्षों से चली आ रही अनेक समस्याओं को दूर किए बिना नियुक्ति प्रक्रिया को पूरी तरह निष्पक्ष, पारदर्शी और विश्वसनीय बनाना किसी भी सरकार के लिए आसान नहीं होगा। माकपा ने कहा कि आयोगों और नियुक्ति प्रक्रिया की मौजूदा समस्याएं नई नहीं हैं, बल्कि राज्य गठन के शुरुआती वर्षों से ही व्यवस्था में अनेक स्तरों पर कमियां बनी रही हैं। इसलिए इस पुरानी बीमारी का उपचार भी व्यापक संस्थागत सुधार के माध्यम से ही संभव है।
पार्टी ने कहा कि जेपीएससी और जेएसएससी जैसी संस्थाओं की कार्यप्रणाली, परीक्षा प्रणाली, नियुक्ति प्रक्रिया, जवाबदेही और पारदर्शिता को मजबूत करना समय की सबसे बड़ी जरूरत है। केवल सरकार बदलने या अधिकारियों के स्थानांतरण से समस्या का स्थायी समाधान नहीं होगा। इसके लिए चयन आयोगों की संरचना, परीक्षा संचालन, प्रश्नपत्र निर्माण, परीक्षा केंद्रों की व्यवस्था, परिणाम प्रकाशन, शिकायत निवारण और पूरी प्रक्रिया की निगरानी को तकनीकी एवं प्रशासनिक रूप से मजबूत करना होगा, ताकि अभ्यर्थियों के मन में किसी भी प्रकार का संदेह पैदा न हो।
माकपा ने भाजपा पर भी निशाना साधते हुए कहा कि सरकार और आंदोलनकारी युवाओं के बीच समझौते से भाजपा परेशान दिखाई दे रही है। पार्टी के अनुसार आंदोलन के दौरान सीबीआई जांच की मांग को लेकर काफी राजनीतिक प्रयास किए गए, लेकिन अंततः वह मुद्दा अपेक्षित परिणाम हासिल नहीं कर सका। माकपा ने आरोप लगाया कि युवाओं की समस्याओं के समाधान के बजाय राजनीतिक दलों को इस पूरे मामले को राजनीतिक संघर्ष का माध्यम बनाने से बचना चाहिए। पार्टी ने कहा कि छात्र-युवाओं के भविष्य से जुड़े सवालों को राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से ऊपर रखकर देखने की जरूरत है।
माकपा ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के रवैये की सराहना करते हुए कहा कि लोकतांत्रिक सरकार की जिम्मेदारी केवल प्रशासन चलाना नहीं, बल्कि जनता और विशेष रूप से युवाओं की चिंताओं को सुनना और उनका समाधान तलाशना भी है। पार्टी ने कहा कि किसी समझौते से सरकार के सामने प्रशासनिक या राजनीतिक कठिनाइयां आती हैं तो भी जनता के जायज सवालों के समाधान से पीछे हटना उचित नहीं है। आंदोलनरत युवाओं से बातचीत कर समाधान की दिशा में आगे बढ़ना लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए एक सकारात्मक उदाहरण है।
हालांकि माकपा ने यह भी स्पष्ट किया कि समझौते के बाद सरकार और आंदोलनकारी युवाओं की जिम्मेदारी समाप्त नहीं हुई है। अब असली परीक्षा समझौते को जमीन पर लागू करने की है। पार्टी ने कहा कि चयन आयोगों और नियुक्ति व्यवस्था में सुधार का रास्ता आसान नहीं होगा और सरकार को कई प्रशासनिक तथा संस्थागत चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा। इसके बावजूद राजनीतिक इच्छाशक्ति, स्पष्ट संकल्प, पारदर्शिता और लगातार निगरानी के साथ सुधार की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जा सकता है।
माकपा ने यह भी कहा कि वर्तमान में सरकारी नौकरी कर रहे सभी कर्मचारियों को भ्रष्ट या पैसे देकर नौकरी हासिल करने वाला मान लेना उचित नहीं होगा। यदि किसी भर्ती प्रक्रिया पर सवाल उठे हैं तो इसकी जांच निष्पक्ष तरीके से होनी चाहिए और जिन अभ्यर्थियों ने अपनी योग्यता के आधार पर नौकरी प्राप्त की है, उनके हितों की भी रक्षा की जानी चाहिए। पार्टी ने प्रभावित कर्मचारियों को न्यायालय की शरण लेने और कानूनी प्रक्रिया पर भरोसा रखने की सलाह दी है। साथ ही व्यापक जनहित और झारखंड के युवाओं की एकता बनाए रखने के लिए सभी पक्षों से धैर्य और संयम बरतने की अपील की है।
माकपा ने कहा कि झारखंड के युवाओं की सबसे बड़ी चिंता रोजगार और निष्पक्ष भर्ती व्यवस्था है। वर्षों तक सरकारी नियुक्तियों में देरी, परीक्षाओं को लेकर विवाद, परिणामों पर उठते सवाल और न्यायिक प्रक्रियाओं के कारण हजारों अभ्यर्थियों का भविष्य प्रभावित होता रहा है। ऐसे में सरकार को अब एक ऐसी स्थायी व्यवस्था विकसित करनी चाहिए जिसमें परीक्षा से लेकर नियुक्ति तक प्रत्येक चरण पारदर्शी हो और किसी भी स्तर पर अनियमितता की गुंजाइश न्यूनतम रहे।
पार्टी ने केंद्र सरकार की शिक्षा नीति और राष्ट्रीय स्तर की परीक्षा व्यवस्था पर भी सवाल उठाया। माकपा ने केंद्र सरकार से राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी (NTA) को समाप्त करने तथा राष्ट्रीय शिक्षा नीति को वापस लेने की मांग की। पार्टी का दावा है कि देश की शिक्षा व्यवस्था को लगातार केंद्रीकरण और परीक्षा-केंद्रित व्यवस्था की ओर ले जाने से विद्यार्थियों पर दबाव बढ़ा है। माकपा ने कहा कि शिक्षा का उद्देश्य केवल प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए विद्यार्थियों को तैयार करना नहीं, बल्कि उन्हें बेहतर नागरिक, सक्षम पेशेवर और सामाजिक रूप से जिम्मेदार व्यक्ति बनाना होना चाहिए।
माकपा ने कहा कि झारखंड में जेपीएससी-जेएसएससी विवाद से निकला सबसे बड़ा सबक यही है कि भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता, संस्थागत जवाबदेही और युवाओं का विश्वास लोकतांत्रिक शासन की अनिवार्य शर्तें हैं। सरकार को अब समझौते की भावना के अनुरूप ठोस कदम उठाने होंगे और युवाओं को भी रचनात्मक निगरानी की भूमिका निभानी होगी। यदि सरकार अपनी प्रतिबद्धता को व्यवहार में उतारती है और युवा धैर्य एवं लोकतांत्रिक तरीके से अपनी आवाज उठाते रहते हैं, तो झारखंड में एक अधिक विश्वसनीय और पारदर्शी नियुक्ति व्यवस्था की नींव रखी जा सकती है।
माकपा ने कहा कि आंदोलनरत छात्र-युवाओं का संघर्ष व्यर्थ नहीं गया है। अब सरकार के सामने चुनौती है कि समझौते को केवल कागज तक सीमित न रखकर उसे वास्तविक प्रशासनिक सुधार में बदला जाए। यही झारखंड के युवाओं, सरकारी भर्ती व्यवस्था और लोकतंत्र—तीनों के हित में होगा।
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