रांची में धरना-प्रदर्शन की पूर्व अनुमति संबंधी निर्देश पर सर्वजन विकास पार्टी ने जताया कड़ा एतराज, कहा—व्यवस्था के नाम पर लोकतांत्रिक अधिकारों का अतिक्रमण स्वीकार्य नहीं
रांची। रांची जिला प्रशासन की ओर से धरना-प्रदर्शन, जुलूस, रैली, घेराव एवं आमसभा जैसे कार्यक्रमों के आयोजन से पहले सक्षम प्राधिकारी से पूर्व अनुमति लेने संबंधी निर्देश को लेकर अब संवैधानिक अधिकारों और लोकतांत्रिक असहमति की स्वतंत्रता पर बहस तेज हो गई है। इस मुद्दे पर सर्वजन विकास पार्टी के संस्थापक सह राष्ट्रीय अध्यक्ष अशोक कुमार झा ने कड़ा एतराज जताते हुए कहा कि लोकतंत्र में सरकार की नीतियों और निर्णयों पर सवाल उठाना नागरिकों का अधिकार है। प्रशासन को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक विरोध की आवाज दबने न पाए।
अशोक कुमार झा ने कहा कि लोकतंत्र केवल चुनाव कराने और सरकार चुनने का नाम नहीं है। लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति जनता को अपनी बात कहने, सरकार की नीतियों की आलोचना करने, गलत निर्णयों के खिलाफ आवाज उठाने और शांतिपूर्ण तरीके से अपनी असहमति दर्ज कराने के अधिकार में निहित है। भारत के संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) नागरिकों को वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रदान करता है, जबकि अनुच्छेद 19(1)(b) शांतिपूर्वक और बिना हथियारों के एकत्र होने के अधिकार को मान्यता देता है। हालांकि संविधान सार्वजनिक व्यवस्था सहित निर्धारित परिस्थितियों में युक्तियुक्त प्रतिबंध की अनुमति देता है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं हो सकता कि प्रशासन अपनी सुविधा या किसी राजनीतिक विचारधारा के आधार पर शांतिपूर्ण असहमति को रोकने लगे।
उन्होंने कहा कि सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि किसी नागरिक, संगठन या राजनीतिक दल को सरकार की किसी नीति या निर्णय का विरोध करना है तो क्या उसे उसी सरकार या उसके अधिकारियों से यह अनुमति भी लेनी होगी कि वह सरकार के खिलाफ अपनी आवाज उठा सकता है या नहीं। यदि पूर्व अनुमति का उद्देश्य केवल यातायात, सुरक्षा, पुलिस व्यवस्था, भीड़ नियंत्रण और आम नागरिकों की सुविधा सुनिश्चित करना है तो ऐसी प्रशासनिक व्यवस्था समझ में आती है। लेकिन यदि अनुमति की प्रक्रिया का इस्तेमाल सरकार की आलोचना करने वाले कार्यक्रमों को रोकने या राजनीतिक असहमति को नियंत्रित करने के लिए किया जाता है तो यह गंभीर संवैधानिक प्रश्न खड़ा करता है।
अशोक कुमार झा ने कहा कि प्रशासन को किसी राजनीतिक दल के कार्यकर्ता के रूप में नहीं, बल्कि अपने संवैधानिक दायित्वों के अनुसार निष्पक्ष रूप से कार्य करना चाहिए। उन्होंने कहा कि हमारे पढ़े-लिखे अधिकारियों को इतना तो समझना चाहिए कि भारतीय संविधान में कहीं यह निर्देश नहीं दिया गया है कि सरकार का विरोध नागरिक कब करेंगे, किस मुद्दे पर करेंगे, किस तरीके से अपनी असहमति व्यक्त करेंगे और सरकार की कौन-सी नीति का विरोध किया जा सकता है, यह सरकार या उसके अधिकारी तय करेंगे। सरकार जनता के प्रति जवाबदेह होती है और जनता को सरकार से सवाल पूछने के लिए सरकार की वैचारिक अनुमति की आवश्यकता नहीं हो सकती।
उन्होंने स्पष्ट किया कि वह प्रशासन द्वारा कानून-व्यवस्था और सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए किए जाने वाले उचित नियमन के खिलाफ नहीं हैं। यदि किसी जुलूस का मार्ग पहले से तय किया जाता है, कार्यक्रम का समय निर्धारित किया जाता है, यातायात के लिए वैकल्पिक व्यवस्था की जाती है, एंबुलेंस और आपातकालीन सेवाओं के लिए रास्ता खुला रखा जाता है तथा सुरक्षा के लिए पर्याप्त पुलिस बल की तैनाती की जाती है, तो ऐसी व्यवस्था सार्वजनिक हित में आवश्यक हो सकती है। लेकिन प्रशासनिक नियमन और लोकतांत्रिक अधिकारों पर रोक के बीच स्पष्ट अंतर होना चाहिए।
अशोक कुमार झा ने कहा कि सरकार और देश को एक समझना लोकतांत्रिक दृष्टि से उचित नहीं है। सरकारें आती-जाती रहती हैं, मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री बदलते हैं, मंत्रिमंडल बदलते हैं और सरकारी नीतियां भी बदलती रहती हैं, लेकिन संविधान और लोकतांत्रिक गणराज्य की व्यवस्था कायम रहती है। इसलिए किसी सरकारी नीति की आलोचना करना अपने आप में राष्ट्रविरोध नहीं है। किसी मंत्री के निर्णय पर सवाल उठाना लोकतंत्र-विरोधी नहीं है और किसी प्रशासनिक आदेश की आलोचना करना भी केवल इसलिए अपराध नहीं माना जा सकता कि उससे सरकार असहज महसूस करती है।
उन्होंने कहा कि शांतिपूर्ण विरोध लोकतंत्र की आत्मा है, लेकिन विरोध के अधिकार को हिंसा का लाइसेंस भी नहीं बनाया जा सकता। यदि किसी आंदोलन के दौरान प्रदर्शनकारियों द्वारा सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाया जाता है, पुलिस या सुरक्षा बल के जवानों पर हमला किया जाता है, सार्वजनिक संपत्ति में तोड़फोड़ की जाती है, आम नागरिकों को जबरन रोका जाता है अथवा कानून-व्यवस्था बिगाड़ने का प्रयास किया जाता है तो ऐसे मामलों में कानून के अनुसार कठोर कार्रवाई होनी चाहिए। इसी प्रकार यदि किसी आंदोलन की आड़ में कानून के तहत अपराध माने जाने वाले देशविरोधी नारे, प्रतीक या अन्य गतिविधियां की जाती हैं तो उनके खिलाफ भी विधिसम्मत कार्रवाई होनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि आंदोलनकारियों को भी अपने संवैधानिक दायित्व को समझना होगा। शांतिपूर्ण सभा का अधिकार तभी लोकतांत्रिक रूप से प्रभावी होगा जब आंदोलन शांतिपूर्ण रहे। प्रदर्शन के दौरान आम नागरिकों, दुकानदारों, विद्यार्थियों, मरीजों, राहगीरों और आपातकालीन सेवाओं के अधिकारों का भी सम्मान होना चाहिए। सड़क पर प्रदर्शन करने वाले नागरिक का अधिकार महत्वपूर्ण है, लेकिन उसी सड़क से गुजरने वाली एंबुलेंस और अस्पताल पहुंचने वाले मरीज का अधिकार भी उतना ही महत्वपूर्ण है। इसलिए लोकतंत्र में अधिकार और जिम्मेदारी दोनों साथ-साथ चलते हैं।
अशोक कुमार झा ने कहा कि प्रशासन को अनुमति देने और अनुमति नहीं देने के लिए स्पष्ट, पारदर्शी और समान मानदंड निर्धारित करने चाहिए। आवेदन पर समयबद्ध तरीके से निर्णय लिया जाना चाहिए और यदि किसी कार्यक्रम को अनुमति नहीं दी जाती है तो उसके कारण लिखित रूप में बताए जाने चाहिए। समान परिस्थितियों में सरकार के समर्थन में होने वाले कार्यक्रम और सरकार की आलोचना में होने वाले कार्यक्रमों के लिए अलग-अलग मापदंड नहीं होने चाहिए। प्रशासनिक शक्ति का इस्तेमाल विचारों की सेंसरशिप के लिए नहीं किया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि संविधान का अनुच्छेद 14 भी प्रशासन के लिए महत्वपूर्ण मार्गदर्शक है, जो कानून के समक्ष समानता और कानूनों के समान संरक्षण की बात करता है। यदि एक संगठन को शांतिपूर्ण कार्यक्रम की अनुमति दी जाती है और दूसरे संगठन को समान परिस्थितियों में केवल उसके राजनीतिक विचारों या सरकार की आलोचना के कारण अनुमति से वंचित किया जाता है तो ऐसी कार्रवाई की संवैधानिक वैधता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
सर्वजन विकास पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने कहा कि लोकतंत्र की शक्ति पत्थरबाजी, आगजनी या हिंसा में नहीं, बल्कि विचार, तर्क और जनमत में है। उन्होंने कहा कि शांतिपूर्ण आंदोलन को कमजोर समझना भी लोकतंत्र के लिए उचित नहीं है। छात्र, किसान, कर्मचारी, व्यापारी, सामाजिक संगठन और आम नागरिक यदि अपनी मांगों को शांतिपूर्ण तरीके से सरकार के सामने रखते हैं तो उनकी आवाज सुनी जानी चाहिए। सरकार का काम असहमति को समाप्त करना नहीं, बल्कि असहमति के लिए संवैधानिक और शांतिपूर्ण स्थान सुनिश्चित करना है।
उन्होंने कहा कि रांची में धरना-प्रदर्शन के लिए पूर्व अनुमति की व्यवस्था को लेकर पूरे मामले को केवल सरकार बनाम विपक्ष या प्रशासन बनाम आंदोलनकारी के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यह सवाल व्यापक रूप से लोकतांत्रिक अधिकारों और प्रशासनिक शक्तियों के संतुलन से जुड़ा है। प्रशासन को यह स्पष्ट करना चाहिए कि पूर्व अनुमति का उद्देश्य केवल सार्वजनिक व्यवस्था, सुरक्षा और यातायात प्रबंधन है या इसके पीछे कोई ऐसी व्यवस्था है जिसके माध्यम से सरकार की आलोचना करने वाले कार्यक्रमों को नियंत्रित किया जा सके।
अशोक कुमार झा ने कहा कि लोकतंत्र में नागरिक का सरकार से सवाल पूछना कोई अपराध नहीं है। यदि सरकार की कोई नीति गलत लगती है तो नागरिक को उसके खिलाफ आवाज उठाने का अधिकार है। यदि छात्र किसी परीक्षा व्यवस्था से असंतुष्ट हैं तो वे अपनी मांग रख सकते हैं। यदि कर्मचारी किसी सेवा नियम का विरोध करते हैं तो वे शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रख सकते हैं। यदि किसान किसी नीति से असहमत हैं तो वे लोकतांत्रिक तरीके से विरोध कर सकते हैं। इसी प्रकार राजनीतिक दल और सामाजिक संगठन भी सरकार के निर्णयों की आलोचना कर सकते हैं।
उन्होंने कहा कि प्रशासन की भूमिका विरोध को खत्म करना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना होना चाहिए कि विरोध शांतिपूर्ण तरीके से हो और उससे आम नागरिकों के अधिकार प्रभावित न हों। इसी प्रकार आंदोलनकारियों की जिम्मेदारी है कि वे कानून का पालन करें, हिंसा से दूर रहें और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान न पहुंचाएं। यदि दोनों पक्ष अपनी-अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी निभाएं तो टकराव की स्थिति काफी हद तक समाप्त की जा सकती है।
अशोक कुमार झा ने अंत में कहा कि लोकतंत्र में “अनुमति व्यवस्था हो सकती है, लेकिन असहमति की अनुमति नहीं हो सकती।” सार्वजनिक स्थान पर बड़े कार्यक्रमों के लिए सुरक्षा, यातायात और कानून-व्यवस्था की दृष्टि से वैधानिक नियमन आवश्यक हो सकता है, लेकिन इस नियमन को नागरिकों की राजनीतिक या वैचारिक असहमति पर नियंत्रण का माध्यम नहीं बनाया जाना चाहिए। सरकार की आलोचना के लिए सरकार की वैचारिक सहमति आवश्यक नहीं है और लोकतंत्र में सवाल पूछने के लिए सत्ता की प्रशंसा करना जरूरी नहीं है।
उन्होंने कहा कि आज आवश्यकता ऐसी व्यवस्था बनाने की है जिसमें “व्यवस्था भी बनी रहे और नागरिक की आवाज भी दबे नहीं।” सरकार और प्रशासन को यह समझना होगा कि शांतिपूर्ण विरोध लोकतंत्र की कमजोरी नहीं, बल्कि लोकतंत्र की ताकत है। वहीं नागरिकों और आंदोलनकारियों को भी यह सुनिश्चित करना होगा कि अपने अधिकारों की रक्षा करते हुए वे दूसरे नागरिकों के अधिकारों का सम्मान करें।
उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था का वास्तविक सवाल यह नहीं होना चाहिए कि “सरकार के खिलाफ प्रदर्शन की अनुमति मिलेगी या नहीं?” बल्कि सवाल यह होना चाहिए कि “शांतिपूर्ण और संवैधानिक विरोध के अधिकार को सुरक्षित रखते हुए सार्वजनिक व्यवस्था कैसे बनाए रखी जाए?” यही संविधान की भावना, लोकतंत्र की मर्यादा और एक उत्तरदायी प्रशासन की वास्तविक कसौटी है।
Reviewed by PSA Live News
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6:41:00 pm
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