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क्या है आरक्षण ? जरूरत या फिर अधिकार। आज समानता की इस कसौटी पर खरा है देश का संविधान


लेखक : अशोक कुमार झा

देश में आरक्षण को लेकर बहस आज केवल राजनीतिक मुद्दा नहीं रह गई है, बल्कि यह संविधान, सामाजिक न्याय, समान अवसर और राष्ट्र के भविष्य से जुड़ा एक गंभीर प्रश्न बन चुकी है। आरक्षण के समर्थन में यह तर्क दिया जाता है कि यह वंचित वर्गों का संवैधानिक अधिकार है और इसे कोई छीन नहीं सकता। दूसरी ओर यह सवाल भी उठता है कि आरक्षण का मूल उद्देश्य क्या था—क्या यह हमेशा के लिए किसी वर्ग को विशेष अवसर देने की व्यवस्था थी या इसका उद्देश्य उन लोगों को आगे बढ़ाना था जो सामाजिक, शैक्षिक और आर्थिक रूप से पिछड़ गए थे?

आरक्षण की अवधारणा को समझने के लिए सबसे पहले उसके उद्देश्य को समझना आवश्यक है। संविधान निर्माताओं के सामने उस समय एक ऐसा समाज था जिसमें अनेक समुदाय लंबे समय से सामाजिक और शैक्षिक अवसरों से वंचित थे। इसलिए राज्य को यह जिम्मेदारी दी गई कि वह ऐसे वर्गों को आगे बढ़ने के लिए विशेष अवसर उपलब्ध कराए, ताकि वे समाज की मुख्यधारा में बराबरी के साथ आ सकें। इसका मूल उद्देश्य सामाजिक असमानता को कम करना और अवसरों की समानता स्थापित करना था। लेकिन समय के साथ आरक्षण को लेकर राजनीतिक भाषा में एक महत्वपूर्ण बदलाव दिखाई देने लगा है। जिस व्यवस्था को सामाजिक उत्थान का माध्यम माना गया था, उसे अब कई बार स्थायी अधिकार के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। यहीं से एक महत्वपूर्ण बहस जन्म लेती है—क्या आरक्षण हमेशा के लिए अधिकार है या फिर उसकी मूल भावना जरूरतमंद व्यक्ति को बराबरी तक पहुंचाने की थी?

जरूरत और अधिकार, इन दोनों शब्दों के अर्थ में बहुत बड़ा अंतर है। जरूरत उस व्यक्ति की होती है जिसके पास पर्याप्त साधन नहीं हैं और जिसे आगे बढ़ने के लिए सहायता की आवश्यकता है। वहीं अधिकार की अवधारणा में व्यक्ति की वास्तविक जरूरत से अलग एक स्थायी दावा शामिल हो सकता है। इसलिए आज देश के सामने यह सवाल रखना आवश्यक है कि आरक्षण का लाभ वास्तव में किसे मिल रहा है? क्या उसका लाभ समाज के सबसे गरीब और सबसे वंचित व्यक्ति तक पहुंच रहा है या फिर वह बार-बार उन्हीं परिवारों और वर्गों के हाथों में केंद्रित होता जा रहा है जो पहले ही आर्थिक, शैक्षिक और राजनीतिक रूप से मजबूत हो चुके हैं?

किसी भी बड़े सामाजिक वर्ग के भीतर आर्थिक और सामाजिक असमानता होना स्वाभाविक है। आरक्षित वर्गों के भीतर भी ऐसे परिवार हैं जो अत्यंत संपन्न हैं और दूसरी ओर उसी समुदाय के ऐसे परिवार भी हैं जो आज तक गरीबी, अशिक्षा, बेरोजगारी और मूलभूत सुविधाओं के अभाव से जूझ रहे हैं। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि यदि किसी व्यवस्था का उद्देश्य सबसे कमजोर व्यक्ति को आगे बढ़ाना है, तो क्या उसकी समय-समय पर समीक्षा नहीं होनी चाहिए? समीक्षा का अर्थ किसी समुदाय के अधिकार छीनना नहीं है। समीक्षा का अर्थ यह देखना है कि व्यवस्था अपने मूल उद्देश्य को पूरा कर रही है या नहीं और उसका लाभ वास्तव में सबसे जरूरतमंद व्यक्ति तक पहुंच रहा है या नहीं।

लोकसभा और विधानसभाओं में आरक्षित सीटों का उद्देश्य राजनीतिक प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना है। लेकिन यहां भी एक गंभीर बहस की आवश्यकता है। क्या आरक्षित सीटों पर उम्मीदवारों का चयन केवल उस वर्ग की पहचान के आधार पर होना चाहिए या उस वर्ग के भीतर वास्तविक रूप से वंचित और जरूरतमंद लोगों को भी राजनीतिक अवसर मिलना चाहिए? भारतीय राजनीति में अनेक ऐसे परिवार हैं जिनकी कई पीढ़ियां सार्वजनिक जीवन में सक्रिय रही हैं। अलग-अलग राजनीतिक दलों में राजनीतिक परिवारों की मौजूदगी कोई नई बात नहीं है। लेकिन लोकतंत्र का उद्देश्य केवल राजनीतिक परिवारों का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना नहीं, बल्कि आम नागरिक को भी नेतृत्व का अवसर देना है। इसलिए प्रश्न किसी व्यक्ति विशेष के विरुद्ध नहीं होना चाहिए, बल्कि व्यवस्था से होना चाहिए कि क्या राजनीति में अवसर का वास्तविक लोकतंत्रीकरण हो रहा है?

सामाजिक न्याय की चर्चा करते समय आर्थिक रूप से कमजोर सामान्य वर्ग के नागरिकों की समस्याओं को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। एक गरीब किसान, मजदूर, छोटा दुकानदार, बेरोजगार युवा या आर्थिक रूप से कमजोर परिवार यदि संकट में है तो उसकी गरीबी केवल इसलिए समाप्त नहीं हो जाती कि वह आरक्षित श्रेणी में नहीं आता। इसी प्रकार किसी आरक्षित वर्ग में जन्म लेने वाला व्यक्ति यदि अत्यंत संपन्न है, उच्च शिक्षा प्राप्त कर चुका है और उसका परिवार कई पीढ़ियों से आर्थिक एवं राजनीतिक रूप से मजबूत है, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या उसे उसी स्तर की सहायता की आवश्यकता है जो किसी अत्यंत गरीब परिवार को है? इसलिए सामाजिक न्याय की चर्चा में जाति के साथ-साथ आर्थिक और सामाजिक वास्तविकताओं को भी गंभीरता से देखने की आवश्यकता है।

यह भी स्पष्ट करना जरूरी है कि आरक्षण पाने वाले प्रत्येक व्यक्ति को अयोग्य या कम प्रतिभाशाली मानना गलत है। आरक्षण के माध्यम से अवसर प्राप्त करने वाले अनेक लोगों ने शिक्षा, प्रशासन, राजनीति, विज्ञान, चिकित्सा और अन्य क्षेत्रों में उत्कृष्ट कार्य किया है। इसलिए बहस किसी व्यक्ति की योग्यता पर हमला करने की नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था तैयार करने की होनी चाहिए जिसमें सामाजिक न्याय और योग्यता के बीच उचित संतुलन कायम रहे। देश को ऐसे प्रशासनिक अधिकारी, डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक, शिक्षक और न्यायविद चाहिए जो अपने क्षेत्र में सक्षम हों और राष्ट्र के प्रति जिम्मेदारी समझते हों। सामाजिक न्याय और उत्कृष्टता एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं; सही नीति दोनों को साथ लेकर चल सकती है।

आज दुनिया ज्ञान, तकनीक, अनुसंधान और नवाचार की प्रतिस्पर्धा में आगे बढ़ रही है। ऐसे समय में देश को अपने हर प्रतिभाशाली युवा की आवश्यकता है। प्रतिभा किसी जाति की संपत्ति नहीं होती, प्रतिभा किसी धर्म की संपत्ति नहीं होती और प्रतिभा किसी वर्ग की संपत्ति नहीं होती। प्रतिभा व्यक्ति की क्षमता है और राष्ट्र की पूंजी है। इसलिए ऐसी कोई भी व्यवस्था नहीं होनी चाहिए जो प्रतिभाशाली युवाओं को निराश करे। लेकिन साथ ही ऐसी व्यवस्था भी नहीं होनी चाहिए जो ऐतिहासिक रूप से वंचित व्यक्ति को केवल इसलिए अवसर से वंचित कर दे कि उसके पास प्रतिस्पर्धा करने के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं थे। समाधान टकराव में नहीं, बल्कि संतुलित व्यवस्था में है।

यदि हम वास्तव में ऐसी स्थिति बनाना चाहते हैं जिसमें आने वाली पीढ़ियों को आरक्षण की आवश्यकता कम होती जाए, तो केवल आरक्षण पर बहस करना पर्याप्त नहीं होगा। हमें सरकारी विद्यालयों की शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करना होगा, गरीब बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध करानी होगी, गांव और छोटे शहरों के युवाओं को प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए पर्याप्त संसाधन देने होंगे, उच्च शिक्षा को आर्थिक रूप से कमजोर विद्यार्थियों के लिए सुलभ बनाना होगा और रोजगार तथा कौशल विकास के अवसर बढ़ाने होंगे। जब शिक्षा और अवसरों में वास्तविक समानता आएगी, तब सामाजिक असमानता भी धीरे-धीरे कम होगी।

आरक्षण की समीक्षा की बात को तुरंत किसी समुदाय के विरोध के रूप में प्रस्तुत करना भी उचित नहीं है। लोकतंत्र में सरकार की आर्थिक नीति की समीक्षा हो सकती है, शिक्षा नीति की समीक्षा हो सकती है, कर व्यवस्था की समीक्षा हो सकती है, तो सामाजिक न्याय की नीतियों की भी समीक्षा हो सकती है। समीक्षा का उद्देश्य किसी समुदाय को कमजोर करना नहीं होना चाहिए, बल्कि यह सुनिश्चित करना होना चाहिए कि जिन लोगों के लिए व्यवस्था बनाई गई थी, उसका वास्तविक लाभ उन्हीं तक पहुंचे। ऐसी समीक्षा संविधान, कानून, न्यायपालिका के निर्णयों, सामाजिक वास्तविकताओं, उपलब्ध आंकड़ों और विशेषज्ञों की राय के आधार पर होनी चाहिए।

किसी भी राजनीतिक या सामाजिक नेता को अपनी बात रखने, आंदोलन करने और सरकार पर लोकतांत्रिक दबाव बनाने का पूरा अधिकार है। लेकिन किसी भी मुद्दे पर हिंसा, अराजकता या देशव्यापी अशांति की धमकी देना लोकतांत्रिक संस्कृति के अनुकूल नहीं हो सकता। यह सिद्धांत सभी पर समान रूप से लागू होना चाहिए। व्यक्ति किसी भी जाति, वर्ग, धर्म या राजनीतिक विचारधारा से संबंधित हो, कानून के सामने समानता होनी चाहिए। लोकतंत्र में अपनी मांग रखने का अधिकार सबको है, लेकिन देश की शांति और कानून-व्यवस्था को चुनौती देने का अधिकार किसी को नहीं हो सकता।

भारत किसी एक जाति का देश नहीं है। यह केवल सवर्णों का नहीं है, केवल पिछड़ों का नहीं है, केवल अनुसूचित जातियों का नहीं है और केवल अनुसूचित जनजातियों का भी नहीं है। यह देश हर नागरिक का है। यह गरीब किसान का भी है, मजदूर का भी है, छोटे दुकानदार का भी है, नौजवान का भी है, महिला का भी है, आदिवासी का भी है, दलित का भी है, पिछड़े वर्ग का भी है और सामान्य वर्ग के गरीब व्यक्ति का भी है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह देश उन बच्चों का भी है जिन्हें आज यह तक नहीं पता कि वे बड़े होकर क्या बनेंगे। हमें यह सोचना होगा कि आने वाली पीढ़ियों को हम कैसी सामाजिक व्यवस्था देकर जाएंगे।

भारत का इतिहास अनेक संघर्षों, बलिदानों और सामाजिक परिवर्तनों से भरा हुआ है। स्वतंत्रता आंदोलन में अलग-अलग क्षेत्रों, समुदायों और वर्गों के लोगों ने योगदान दिया। लेकिन स्वतंत्रता संग्राम के योगदान को आज की जातिगत राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का हथियार बनाना उचित नहीं होगा। हमारे पूर्वजों ने जिस स्वतंत्र राष्ट्र की कल्पना की थी, उसका उद्देश्य आने वाली पीढ़ियों को आपस में लड़ाना नहीं था। हमें इतिहास से प्रेरणा लेनी चाहिए, लेकिन इतिहास को समाज में स्थायी वैमनस्य पैदा करने के लिए इस्तेमाल नहीं करना चाहिए।

संविधान की प्रस्तावना न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुता की बात करती है। यही चार शब्द हमारे लोकतंत्र की मूल दिशा निर्धारित करते हैं। न्याय का अर्थ है कि कमजोर के साथ अन्याय न हो। समानता का अर्थ है कि प्रत्येक नागरिक को आगे बढ़ने का अवसर मिले। स्वतंत्रता का अर्थ है कि व्यक्ति अपने जीवन का रास्ता चुन सके और बंधुता का अर्थ है कि समाज के लोग एक-दूसरे के शत्रु न बनें। इसलिए यदि कोई नीति सामाजिक न्याय को मजबूत करती है तो उसे मजबूत किया जाना चाहिए और यदि किसी नीति में समय के साथ खामियां पैदा हो गई हैं तो उन खामियों को दूर किया जाना चाहिए। यही संविधान की जीवंत भावना है।

आरक्षण की बहस को केवल इस सवाल तक सीमित कर देना कि आरक्षण रहेगा या समाप्त होगा, समस्या का समाधान नहीं है। हमें एक व्यापक सामाजिक न्याय नीति पर विचार करना होगा। गरीबी, शिक्षा, सामाजिक पिछड़ापन, क्षेत्रीय पिछड़ापन, पारिवारिक आर्थिक स्थिति और अवसरों की वास्तविक उपलब्धता जैसे विभिन्न कारकों का वैज्ञानिक अध्ययन किया जाना चाहिए। जो व्यक्ति वास्तव में सबसे पीछे है, उसे प्राथमिकता मिलनी चाहिए। जो परिवार कई पीढ़ियों से आर्थिक और सामाजिक रूप से मजबूत हो चुका है, उसके संदर्भ में भी संविधान और कानून के दायरे में उचित नीति पर विचार होना चाहिए। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि आरक्षण को केवल वोट बैंक की राजनीति का साधन नहीं बनाया जाना चाहिए।

आज देश को यह तय करना होगा कि हम अपने बच्चों को कैसी विरासत देना चाहते हैं। क्या हम उन्हें जातियों में बंटा हुआ समाज देंगे या ऐसा समाज बनाएंगे जिसमें व्यक्ति की मेहनत, प्रतिभा और वास्तविक जरूरत को अधिक महत्व मिले? क्या हम ऐसी व्यवस्था चाहते हैं जिसमें सहायता पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलती रहे या ऐसी व्यवस्था जिसमें सहायता का उद्देश्य व्यक्ति को इतना सक्षम बनाना हो कि एक दिन उसे किसी विशेष सहायता की आवश्यकता ही न रहे?

मेरी दृष्टि में सामाजिक न्याय का अंतिम लक्ष्य केवल आरक्षण को बनाए रखना नहीं होना चाहिए। अंतिम लक्ष्य ऐसी सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था का निर्माण होना चाहिए जिसमें किसी बच्चे को आगे बढ़ने के लिए अपनी जाति की पहचान का सहारा लेने की आवश्यकता न पड़े। आरक्षण पर बहस होनी चाहिए, लेकिन वह तथ्यों पर आधारित होनी चाहिए। बहस संविधान की भावना के भीतर होनी चाहिए। बहस आंकड़ों और वास्तविक परिस्थितियों के आधार पर होनी चाहिए। बहस गरीब और वंचित व्यक्ति के हित में होनी चाहिए और सबसे बढ़कर यह बहस समाज को तोड़ने के लिए नहीं, बल्कि समाज को जोड़ने के लिए होनी चाहिए।

किसी भी समुदाय को धमकी देने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए और किसी दूसरे समुदाय को डरने की भी आवश्यकता नहीं होनी चाहिए। लोकतंत्र में अंतिम शक्ति किसी जाति की नहीं होती, अंतिम शक्ति संविधान की होती है। और संविधान की सबसे बड़ी ताकत न्याय, समानता और बंधुता है। इसलिए आज आवश्यकता आरक्षण की राजनीति को और अधिक तीखा करने की नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय की पूरी व्यवस्था की ईमानदार, संवैधानिक और तथ्यपरक समीक्षा करने की है। लक्ष्य किसी को पीछे करना नहीं, बल्कि उस हर व्यक्ति को आगे लाना होना चाहिए जो वास्तव में पीछे छूट गया है। यही सामाजिक न्याय का वास्तविक अर्थ है और यही एक मजबूत, समान और समावेशी राष्ट्र की दिशा भी है।

क्या है आरक्षण ? जरूरत या फिर अधिकार। आज समानता की इस कसौटी पर खरा है देश का संविधान क्या है आरक्षण ? जरूरत या फिर अधिकार। आज समानता की इस कसौटी पर खरा है देश का संविधान Reviewed by PSA Live News on 5:20:00 pm Rating: 5

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