एक तरफ छात्रों की जीत, दूसरी तरफ नौकरी गंवाने वालों का आक्रोश; CBI जांच पर अब भी अड़े आंदोलनकारी
संपादक: अशोक कुमार झा।
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की अध्यक्षता में हुई विशेष कैबिनेट बैठक में JSSC-CGL सहित TDPL के माध्यम से 2014 से कराई गई परीक्षाओं, उनके परिणामों और उनसे जुड़ी चयन प्रक्रिया को रद्द करने का निर्णय लिया गया। सरकार के इस फैसले को आंदोलनरत छात्रों ने अपनी बड़ी जीत के रूप में देखा। कई स्थानों पर छात्रों ने खुशी जताई और आंदोलन की अपनी प्रमुख मांग पूरी होने की बात कही।
लेकिन सरकार के इस फैसले का दूसरा पहलू बेहद गंभीर है।
जिन अभ्यर्थियों ने इन परीक्षाओं को पास करने के बाद सरकारी नौकरी हासिल की थी, उनके सामने अब अपने रोजगार और भविष्य का सवाल खड़ा हो गया है। रिपोर्टों के अनुसार JSSC-CGL के माध्यम से नियुक्त करीब 2,000 अभ्यर्थियों की नौकरी प्रभावित होने की स्थिति बनी है। नियुक्त अभ्यर्थियों का तर्क है कि यदि भर्ती प्रक्रिया में कहीं गड़बड़ी हुई थी तो उसकी जांच होनी चाहिए, लेकिन उन अभ्यर्थियों को दोषी क्यों माना जाए जिन्होंने परीक्षा पास कर नियुक्ति प्राप्त की और वर्षों से सेवा दे रहे हैं?
इसी सवाल को लेकर नियुक्त अभ्यर्थियों ने अब आंदोलन का रास्ता पकड़ लिया है। रांची में नियुक्त अभ्यर्थियों के धरने से सरकार के सामने एक नई चुनौती पैदा हो गई है। उनका कहना है कि जब तक सरकार अपने फैसले को वापस नहीं लेती अथवा उनके भविष्य को सुरक्षित करने का कोई ठोस रास्ता नहीं निकालती, तब तक उनका आंदोलन जारी रहेगा।
एक आंदोलन खत्म हुआ तो दूसरा शुरू
झारखंड सरकार के लिए सबसे बड़ी विडंबना यही है कि जिस फैसले से एक आंदोलन को शांत करने की उम्मीद की जा रही थी, उसी फैसले ने दूसरे वर्ग को सड़क पर ला दिया है।
एक तरफ वे छात्र हैं जो लंबे समय से कथित परीक्षा गड़बड़ी, पेपर लीक और भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता की मांग को लेकर आंदोलन कर रहे थे। दूसरी तरफ वे अभ्यर्थी हैं जिन्होंने उसी व्यवस्था से परीक्षा पास कर नौकरी हासिल की और अब सरकार के फैसले से उनकी नौकरी पर संकट आ गया है।
यानी सरकार के सामने अब सवाल सिर्फ परीक्षा रद्द करने का नहीं है, बल्कि निष्पक्षता, कानूनी प्रक्रिया और हजारों परिवारों के भविष्य का भी है।
छात्रों को मिली राहत, लेकिन CBI जांच की मांग बरकरार
परीक्षा रद्द होने के बाद आंदोलनरत छात्रों में निश्चित रूप से संतोष है। उनकी प्रमुख मांगों में विवादित परीक्षाओं को रद्द करना शामिल था और सरकार ने उस दिशा में बड़ा कदम उठाया है। लेकिन छात्रों का आंदोलन पूरी तरह समाप्त होने से पहले ही उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि केवल परीक्षा रद्द करना पर्याप्त नहीं है।
आंदोलनकारी छात्र कथित अनियमितताओं की निष्पक्ष और व्यापक जांच चाहते हैं तथा CBI जांच की मांग पर अब भी जोर दे रहे हैं। कुछ रिपोर्टों के अनुसार छात्रों ने सरकार को आगे की कार्रवाई के लिए समय-सीमा भी दी है।
यही कारण है कि सरकार के सामने अब दो अलग-अलग सवाल हैं—पहला, भर्ती प्रक्रिया में यदि वास्तव में गड़बड़ी हुई है तो दोषियों तक कैसे पहुंचा जाए; और दूसरा, यदि किसी अभ्यर्थी ने स्वयं कोई अनियमितता नहीं की है तो उसकी नौकरी और भविष्य की रक्षा कैसे की जाए?
सरकार के सामने सबसे कठिन परीक्षा
लोकतंत्र में सरकार के लिए परीक्षा सिर्फ चुनाव के समय नहीं होती। कई बार ऐसे प्रशासनिक और सामाजिक संकट सामने आते हैं, जहां एक निर्णय से एक वर्ग को राहत मिलती है तो दूसरा वर्ग प्रभावित हो जाता है।
झारखंड में मौजूदा भर्ती विवाद भी कुछ ऐसा ही दिखाई दे रहा है।
यदि सरकार परीक्षा रद्द करती है तो नौकरी पा चुके अभ्यर्थियों का भविष्य संकट में पड़ता है। यदि सरकार परीक्षा रद्द नहीं करती तो आंदोलनरत छात्रों के सवालों और कथित अनियमितताओं पर सरकार की विश्वसनीयता प्रभावित होती है। यदि केवल विभागीय या CID जांच होती है तो छात्र CBI जांच की मांग करते हैं। और यदि जांच लंबी चलती है तो वर्षों से नौकरी कर रहे कर्मचारियों और उनके परिवारों की चिंता बढ़ती जाती है।
ऐसे में सरकार के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि न्याय किसे मिले और किस तरीके से मिले?
दोषियों पर कार्रवाई हो, निर्दोषों का भविष्य भी सुरक्षित रहे
भर्ती परीक्षाओं में यदि किसी भी स्तर पर गड़बड़ी हुई है तो उसकी निष्पक्ष जांच और दोषियों पर कार्रवाई आवश्यक है। सरकारी नौकरी पाने के लिए वर्षों मेहनत करने वाले युवाओं के साथ अन्याय भी स्वीकार नहीं किया जा सकता और परीक्षा व्यवस्था में कथित भ्रष्टाचार को नजरअंदाज करना भी उचित नहीं होगा।
लेकिन इसके साथ यह भी सुनिश्चित करना होगा कि किसी अनियमितता के लिए वास्तविक रूप से जिम्मेदार व्यक्ति और एक सामान्य परीक्षार्थी को एक ही तराजू में न तौला जाए।
जो अभ्यर्थी ईमानदारी से परीक्षा में शामिल हुए, चयनित हुए और नियुक्ति के बाद सरकारी सेवा कर रहे हैं, उनके अधिकारों और भविष्य पर भी गंभीरता से विचार करना सरकार की जिम्मेदारी है।
अब सरकार को निकालना होगा बीच का रास्ता
मौजूदा हालात में टकराव बढ़ाने के बजाय सरकार को सभी पक्षों के साथ बातचीत का रास्ता अपनाना चाहिए। आंदोलनरत छात्रों, नियुक्त अभ्यर्थियों, विशेषज्ञों और संबंधित विभागों के प्रतिनिधियों के साथ संवाद कर ऐसी व्यवस्था तैयार की जा सकती है जिसमें जांच भी हो और निर्दोष नियुक्त कर्मचारियों के हितों की भी रक्षा हो।
सरकार चाहे तो जांच पूरी होने तक नियुक्त अभ्यर्थियों की स्थिति को लेकर अंतरिम व्यवस्था पर विचार कर सकती है और जिन मामलों में व्यक्तिगत स्तर पर किसी प्रकार की गड़बड़ी साबित नहीं होती, उनके भविष्य के लिए कानूनी और प्रशासनिक रास्ता तलाश सकती है।
सबसे जरूरी है कि पूरे मामले में पारदर्शिता रखी जाए। सरकार को यह स्पष्ट करना होगा कि किस परीक्षा में क्या गड़बड़ी मिली, किन आधारों पर परीक्षा रद्द की गई, किन नियुक्तियों पर इसका असर पड़ेगा और आगे की भर्ती प्रक्रिया किस तरह होगी।
अब देखना है आगे क्या होता है
झारखंड का छात्र आंदोलन अब केवल परीक्षा रद्द कराने का आंदोलन नहीं रह गया है। यह मामला अब भर्ती व्यवस्था की विश्वसनीयता, सरकारी निर्णयों की संवैधानिकता, नियुक्त अभ्यर्थियों के अधिकार और भविष्य की प्रतियोगी परीक्षाओं की पारदर्शिता से जुड़ गया है।
एक तरफ छात्रों को लगा है कि उनकी आवाज सरकार तक पहुंची और उनकी मांग पर बड़ा फैसला हुआ। दूसरी तरफ नौकरी पा चुके अभ्यर्थी पूछ रहे हैं—“अगर हमने कोई गड़बड़ी नहीं की तो हमारी नौकरी क्यों जाए?”
यही सवाल अब झारखंड सरकार की सबसे बड़ी चुनौती बन चुका है।
सरकार के लिए रास्ता आसान नहीं है। एक तरफ आंदोलनरत छात्रों का दबाव है, दूसरी तरफ नियुक्त अभ्यर्थियों का आक्रोश। बीच में न्यायिक और प्रशासनिक प्रक्रिया की जटिलताएं हैं।
ऐसे में आने वाले दिनों में सरकार क्या रास्ता निकालती है, क्या नियुक्त अभ्यर्थियों को राहत मिलती है, क्या छात्रों की CBI जांच की मांग पर कोई फैसला होता है और क्या पूरी भर्ती व्यवस्था को लेकर कोई स्थायी सुधार सामने आता है—इन सभी सवालों के जवाब पर अब पूरे झारखंड की नजर है।
Reviewed by PSA Live News
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6:52:00 pm
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