सुप्रीम कोर्ट ने झारखंड हाईकोर्ट पर जताई सख्त नाराज़गी — आरक्षित निर्णयों के लंबित रहने को बताया “न्यायिक विवेक को झकझोरने वाला”
नई दिल्ली/रांची, 12 नवम्बर 2025। झारखंड उच्च न्यायालय में लम्बे समय से लंबित पड़े आरक्षित फैसलों (Reserved Judgments) को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर चिंता जताई है। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि न्यायालयों में मामलों पर सुनवाई पूरी होने के बाद निर्णयों का महीनों या वर्षों तक लंबित रहना न्यायिक प्रणाली की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।
यह टिप्पणी सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस एम.एम. सुंदरेश और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की खंडपीठ ने की। बेंच ने झारखंड हाईकोर्ट की ओर से दायर एक हलफनामे (affidavit) का अवलोकन करने के बाद कहा कि —
“हाईकोर्ट की यह स्थिति न्यायिक विवेक को झकझोर देने वाली है। यह संकेत करती है कि फैसलों का लंबित रहना अब एक गंभीर और व्यापक समस्या बन गई है।”
मिवान स्टील्स लिमिटेड बनाम भारत कोकिंग कोल लिमिटेड केस में उठाया गया मुद्दा
यह टिप्पणी सुप्रीम कोर्ट ने मिवान स्टील्स लिमिटेड बनाम भारत कोकिंग कोल लिमिटेड (डायरी नंबर 48094/2025) मामले की सुनवाई के दौरान की।
इस याचिका में झारखंड हाईकोर्ट में लम्बे समय से आरक्षित निर्णय दिए बिना रखे गए मामलों का मुद्दा सामने आया था।
सुप्रीम कोर्ट में दायर दस्तावेज़ों के अनुसार, झारखंड हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल द्वारा दाखिल हलफनामे में यह स्वीकार किया गया कि कई मामलों में सुनवाई पूरी होने के बावजूद फैसले अब तक घोषित नहीं किए गए हैं। यह स्थिति न केवल वादियों के न्याय की प्रतीक्षा को बढ़ाती है, बल्कि अदालतों में लोगों के विश्वास को भी प्रभावित करती है।
“न्याय में देरी, न्याय से इनकार के समान” — सुप्रीम कोर्ट की कठोर टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि —
“जब कोई मामला सुनवाई के बाद निर्णय के लिए सुरक्षित कर लिया जाता है, तो न्यायाधीशों पर यह नैतिक और विधिक दायित्व होता है कि वे यथाशीघ्र निर्णय दें। आरक्षित निर्णयों का महीनों तक लंबित रहना न्याय में देरी के समान है, और न्याय में देरी, न्याय से इनकार के बराबर मानी जाती है।”
न्यायालय ने कहा कि यह स्थिति न्यायिक प्रशासन की कार्यकुशलता पर सवाल उठाती है। साथ ही, इससे यह संदेश जाता है कि निर्णय देने की प्रक्रिया में अनुशासन और समयबद्धता की कमी है।
हलफनामे में खुलासा — झारखंड हाईकोर्ट में कई आरक्षित फैसले अभी तक अधर में
रजिस्ट्रार जनरल द्वारा दाखिल हलफनामे में बताया गया है कि झारखंड हाईकोर्ट में कई पुराने मामलों पर सुनवाई पूरी हो चुकी है, परंतु निर्णय अभी तक नहीं सुनाया गया है। कुछ मामलों में तो निर्णय महीनों से नहीं आया है, जबकि कुछ अन्य में यह अवधि एक वर्ष से अधिक की बताई गई है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस तरह की स्थिति से न केवल न्याय प्रणाली की विश्वसनीयता कमजोर होती है, बल्कि यह संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत नागरिकों के निष्पक्ष और शीघ्र न्याय के अधिकार का भी उल्लंघन है।
सुप्रीम कोर्ट ने जारी किया निर्देश — हाईकोर्ट मुख्य न्यायाधीश करें निगरानी
शीर्ष न्यायालय ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए झारखंड हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश (Chief Justice) से कहा है कि वे सभी आरक्षित मामलों की सूची का परीक्षण करें और यह सुनिश्चित करें कि निर्णय एक निश्चित समयसीमा में सुनाए जाएँ।
बेंच ने यह भी कहा कि अगर किसी कारण से निर्णय देने में देरी होती है, तो उसके लिए स्पष्ट कारण लिखित रूप में दर्ज किए जाएँ।
न्यायालय ने यह भी संकेत दिया कि भविष्य में यदि आरक्षित निर्णयों के लंबित रहने पर शिकायतें दोहराई जाती हैं, तो सुप्रीम कोर्ट संपूर्ण न्यायिक जवाबदेही तंत्र (Judicial Accountability Mechanism) पर विचार कर सकता है।
न्यायिक पारदर्शिता और जवाबदेही पर फिर उठा प्रश्न
इस मामले ने एक बार फिर देशभर में न्यायिक पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर बहस छेड़ दी है। न्याय विशेषज्ञों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी केवल झारखंड हाईकोर्ट तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे न्यायिक तंत्र के लिए चेतावनी है कि “समय पर निर्णय देना न्यायपालिका की प्राथमिक जिम्मेदारी है।”
विधि विशेषज्ञों के अनुसार, उच्च न्यायालयों में हजारों मामले ऐसे हैं जिन पर सुनवाई पूरी हो चुकी है, परंतु निर्णय अभी तक सुरक्षित रखा गया है। इससे न केवल मुकदमेबाजों का आर्थिक और मानसिक बोझ बढ़ता है, बल्कि न्याय की गति पर भी सवाल उठता है।
न्याय में समयबद्धता का सिद्धांत
सुप्रीम कोर्ट ने पहले भी कई अवसरों पर यह स्पष्ट किया है कि आरक्षित निर्णयों को अधिकतम तीन महीने के भीतर सुनाया जाना चाहिए।
2011 में अनिल राय बनाम स्टेट ऑफ बिहार के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि यदि तीन महीने के भीतर निर्णय नहीं दिया जाता, तो पक्षकारों को यह अधिकार है कि वे अदालत से निर्णय सुनाने के लिए अनुरोध कर सकें।
अब झारखंड हाईकोर्ट के मामले में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी उसी चेतावनी की पुनरावृत्ति मानी जा रही है।
संभावित असर — हाईकोर्टों को तय करनी होगी आंतरिक समय-सीमा
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट की इस कड़ी टिप्पणी के बाद झारखंड हाईकोर्ट सहित सभी उच्च न्यायालयों को आरक्षित निर्णयों के लंबित रहने की निगरानी के लिए एक पारदर्शी तंत्र विकसित करना होगा।
साथ ही, न्यायाधीशों के कार्य निष्पादन की वार्षिक समीक्षा में भी ऐसे मामलों को शामिल किया जा सकता है।
सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी भारतीय न्यायपालिका के लिए एक ‘सेल्फ-इंट्रोस्पेक्शन कॉल’ के रूप में देखी जा रही है। न्याय में समयबद्धता और पारदर्शिता ही जनता के विश्वास की नींव है।
अगर झारखंड हाईकोर्ट अपने आरक्षित मामलों पर शीघ्र निर्णय नहीं सुनाता, तो संभव है कि सुप्रीम कोर्ट भविष्य में और सख्त रुख अपनाए।
Reviewed by PSA Live News
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9:37:00 pm
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