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'एक ट्रिलियन में कितने जीरो होते हैं?' से राज्यसभा की सियासत तक: गौरव वल्लभ पर जेएमएम का तंज, झारखंड की राजनीति में फिर गरमाया 'जीरो' वाला विवाद


 रांची। झारखंड की राज्यसभा राजनीति के बीच एक बार फिर वह पुराना सवाल सुर्खियों में आ गया है, जिसने कभी राष्ट्रीय राजनीति में जबरदस्त चर्चा बटोरी थी—"एक ट्रिलियन में कितने जीरो होते हैं?" यह वही सवाल है, जिसे कांग्रेस के प्रवक्ता रहते हुए अर्थशास्त्री और प्रोफेसर गौरव वल्लभ ने भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता संबित पात्रा से टीवी बहस के दौरान पूछा था। उस समय यह वीडियो सोशल मीडिया पर इतना वायरल हुआ था कि गौरव वल्लभ रातोंरात कांग्रेस के सबसे चर्चित चेहरों में शामिल हो गए थे।

लेकिन राजनीति का चक्र ऐसा घूमता है कि आज वही गौरव वल्लभ भाजपा में हैं और झारखंड से राज्यसभा जाने की संभावनाओं को लेकर चर्चा के केंद्र में आ गए। हालांकि, राज्यसभा चुनाव के लिए भाजपा की ओर से उन्हें टिकट नहीं मिलने के बाद अब विपक्षी दलों ने इस मुद्दे को राजनीतिक हथियार बना लिया है।

जेएमएम का तंज: 'भाजपा इनसे ZERO गिनवाती रही'

झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) ने सोशल मीडिया मंचों पर एक पोस्ट साझा कर भाजपा और गौरव वल्लभ दोनों पर निशाना साधा। जेएमएम ने लिखा—

"भाजपा इनसे ZERO गिनवाती रही और बड़े सूटकेस वाले गुजराती को राज्यसभा सीट बेच दिया।"

यह टिप्पणी सीधे तौर पर गौरव वल्लभ के उस पुराने वायरल वीडियो और भाजपा की उम्मीदवार चयन प्रक्रिया को जोड़कर की गई। जेएमएम के इस पोस्ट के बाद राजनीतिक गलियारों में बहस तेज हो गई है। समर्थक और विरोधी दोनों पक्ष सोशल मीडिया पर अपनी-अपनी प्रतिक्रियाएं दे रहे हैं।

राज्यसभा जाने का सपना अधूरा?

राजनीतिक सूत्रों के अनुसार, गौरव वल्लभ झारखंड से भाजपा उम्मीदवार के रूप में राज्यसभा भेजे जाने की उम्मीद लगाए हुए थे। बताया जा रहा है कि उन्होंने नामांकन पत्र तक खरीद लिया था और अंतिम समय तक पार्टी के फैसले का इंतजार करते रहे।

हालांकि, भाजपा नेतृत्व ने लंबे समय तक अपने पत्ते नहीं खोले और अंततः परिस्थितियां गौरव वल्लभ के पक्ष में नहीं बन सकीं। इसके बाद राजनीतिक चर्चाओं का बाजार गर्म हो गया कि आखिर भाजपा ने उस चेहरे को मौका क्यों नहीं दिया, जिसने कांग्रेस छोड़कर पार्टी का दामन थामा था और टीवी बहसों में भाजपा के पक्ष को मजबूती से रखा था।

जेएमएम-कांग्रेस ने उतारे अपने उम्मीदवार

इधर, राज्यसभा चुनाव को लेकर सत्तारूढ़ गठबंधन ने अपने उम्मीदवारों की घोषणा कर दी है। झारखंड मुक्ति मोर्चा ने बैजनाथ राम को अपना प्रत्याशी बनाया है, जबकि कांग्रेस ने प्रणव झा को मैदान में उतारा है। गठबंधन की संख्यात्मक स्थिति को देखते हुए दोनों उम्मीदवारों की जीत लगभग तय मानी जा रही है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा की रणनीति और उम्मीदवार चयन को लेकर भविष्य में भी सवाल उठते रहेंगे, खासकर तब जब पार्टी में हाल के वर्षों में शामिल हुए नेताओं की अपेक्षाएं पूरी नहीं होती दिखाई देती हैं।

कांग्रेस से भाजपा तक का सफर

गौरव वल्लभ का राजनीतिक जीवन भी काफी उतार-चढ़ाव भरा रहा है। अर्थशास्त्र के जानकार और शिक्षाविद् के रूप में पहचान बनाने वाले गौरव वल्लभ लंबे समय तक कांग्रेस का प्रमुख चेहरा रहे। टीवी डिबेट्स में उनकी आक्रामक शैली और आर्थिक मुद्दों पर पकड़ ने उन्हें राष्ट्रीय पहचान दिलाई।

लेकिन बाद में उन्होंने कांग्रेस से इस्तीफा देकर भाजपा का दामन थाम लिया। पार्टी परिवर्तन के दौरान उन्होंने कांग्रेस नेतृत्व की कार्यशैली पर सवाल भी उठाए थे और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व की प्रशंसा की थी।

झारखंड से पुराना नाता

हालांकि गौरव वल्लभ का जन्म राजस्थान के जोधपुर में हुआ, लेकिन उनका झारखंड से भी गहरा संबंध रहा है। वे जमशेदपुर स्थित प्रतिष्ठित प्रबंधन संस्थान एक्सएलआरआई में प्रोफेसर के रूप में कार्य कर चुके हैं। इसी कारण झारखंड की राजनीति में उनका एक अलग परिचय रहा है।

रघुवर दास के खिलाफ चुनावी मुकाबला

वर्ष 2019 के झारखंड विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने उन्हें जमशेदपुर पूर्वी विधानसभा सीट से मैदान में उतारा था। यह चुनाव इसलिए भी चर्चित रहा क्योंकि उनके सामने तत्कालीन मुख्यमंत्री रघुवर दास चुनाव लड़ रहे थे।

हालांकि, इस मुकाबले का परिणाम अप्रत्याशित रहा। भाजपा के दिग्गज नेता रघुवर दास और कांग्रेस प्रत्याशी गौरव वल्लभ दोनों को पीछे छोड़ते हुए निर्दलीय उम्मीदवार सरयू राय ने जीत दर्ज की। यह झारखंड की राजनीति के सबसे चर्चित चुनावी उलटफेरों में से एक माना जाता है।

राजस्थान में भी नहीं मिली सफलता

झारखंड के बाद कांग्रेस ने गौरव वल्लभ को राजस्थान विधानसभा चुनाव में भी मौका दिया। उन्हें उदयपुर विधानसभा सीट से उम्मीदवार बनाया गया, लेकिन वहां भी उन्हें हार का सामना करना पड़ा।

लगातार चुनावी असफलताओं के बावजूद उनकी राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनी रही और राजनीतिक दलों में उनकी उपयोगिता को लेकर चर्चाएं होती रहीं।

'जीरो' से शुरू हुई बहस फिर चर्चा में

राज्यसभा चुनाव के बहाने एक बार फिर गौरव वल्लभ का वही पुराना सवाल राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बन गया है। कभी टीवी स्टूडियो में पूछा गया "एक ट्रिलियन में कितने जीरो होते हैं?" वाला सवाल आज झारखंड की सियासत में तंज और कटाक्ष का माध्यम बन चुका है।

राजनीति में परिस्थितियां कितनी तेजी से बदलती हैं, इसका उदाहरण गौरव वल्लभ का सफर माना जा सकता है। कभी भाजपा के कट्टर आलोचक रहे गौरव वल्लभ आज उसी पार्टी का हिस्सा हैं, लेकिन राज्यसभा की दहलीज तक पहुंचकर भी मंजिल उनसे दूर रह गई। दूसरी ओर, विपक्ष इस पूरे घटनाक्रम को भाजपा की आंतरिक राजनीति और उम्मीदवार चयन प्रक्रिया पर सवाल खड़े करने के अवसर के रूप में देख रहा है।

अब यह देखना दिलचस्प होगा कि राज्यसभा चुनाव के बाद गौरव वल्लभ की राजनीतिक भूमिका क्या होती है और क्या भाजपा भविष्य में उन्हें कोई नई जिम्मेदारी सौंपती है या फिर 'जीरो' वाला यह राजनीतिक प्रसंग लंबे समय तक उनके साथ जुड़ा रहेगा।

'एक ट्रिलियन में कितने जीरो होते हैं?' से राज्यसभा की सियासत तक: गौरव वल्लभ पर जेएमएम का तंज, झारखंड की राजनीति में फिर गरमाया 'जीरो' वाला विवाद 'एक ट्रिलियन में कितने जीरो होते हैं?' से राज्यसभा की सियासत तक: गौरव वल्लभ पर जेएमएम का तंज, झारखंड की राजनीति में फिर गरमाया 'जीरो' वाला विवाद Reviewed by PSA Live News on 9:19:00 pm Rating: 5

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